BAPS-एफिल टावर विवाद में अब किस तरह की जांच होगी?

पेरिस के एफिल टावर पर BAPS प्रतिनिधिमंडल के दौरे के दौरान महिला कर्मचारियों को दूर रखने के आरोप पर विवाद बढ़ा. अब पेरिस प्रशासन की जांच में घटना की पूरी सच्चाई और जिम्मेदारी तय करने की कोशिश होगी

BAPS के साधुओं ने 5 सितंबर को एफिल टावर का दौरा किया था

दुनिया में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले पर्यटन स्थलों में से एक पेरिस का एफिल टावर 8 सितंबर को एक दिन बंद रहने के बाद फिर खुल गया. इसके साथ ही 72 घंटे से चल रहा विवाद भी खुलकर सामने आया. विवाद तब शुरू हुआ जब गुजरात में मुख्यालय वाले हिंदू संगठन बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (BAPS) ने संप्रदाय के आध्यात्मिक प्रमुख की निजी यात्रा के दौरान एफिल टावर पर महिलाओं की मौजूदगी कम रखने को कहा.

5 सितंबर को BAPS के करीब 100 सदस्यों ने संस्था के प्रमुख महंत स्वामी महाराज के साथ एफिल टावर का दौरा किया था. इससे दो दिन पहले उन्होंने पेरिस के पास ब्युस्सी-सेंट-जॉर्ज में फ्रांस के पहले पारंपरिक हिंदू मंदिर का उद्घाटन किया था.

महंत स्वामी महाराज की यात्रा के दौरान एफिल टावर की महिला कर्मचारियों को अपनी ड्यूटी की जगह छोड़ने, दूसरी जगह जाने या उनके साथ आए लोगों के वहां से गुजरने तक कुछ जगहों पर न जाने को कहा गया. कुछ जगहों पर उनकी जगह पुरुष कर्मचारियों को ड्यूटी पर लगाया गया.

टावर का काम देखने वाली कंपनी एसईटीई (SETE) ने बताया कि BAPS के साथ आए लोगों ने “महिलाओं से बातचीत कम रखने” को कहा था. SETE ने यह भी माना कि “इस तरह की बात नहीं माननी चाहिए थी”.

8 सितंबर को एफिल टावर के कर्मचारियों ने विरोध में काम बंद कर दिया. फ्रांस के सबसे बड़े ट्रेड यूनियन संगठन और कर्मचारियों के लिए काम करने वाले कन्फेडरेशन जेनेराल द्यु त्रवाय (CGT) ने “काम से जुड़े ऐसे निर्देशों” पर नाराजगी जताई, जिनकी वजह से महिला कर्मचारियों को सिर्फ महिला होने के कारण काम से दूर किया गया, उनकी जगह पुरुषों को लगाया गया और उन्हें लोगों की नजरों से दूर रखा गया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, CGT की डायान दावोआन ने कहा, “जब BAPS के साथ आए लोग वहां से गुजर रहे थे तब महिलाओं से अपनी काम की जगह छोड़ने के लिए कहा गया, ताकि उनकी जगह पुरुष काम कर सकें.”

BAPS के प्रमुख स्वामी महाराज (फोटो : baps.org)

डायान दावोआन ने बताया, “वीकेंड के दौरान तनाव बढ़ गया. इसलिए आज सुबह कर्मचारियों ने बैठक करने का फैसला किया. पहला मकसद मैनेजमेंट से बात करना था और दूसरा यह पक्का करना था कि कंपनी में महिलाओं के साथ दोबारा कभी इस तरह का व्यवहार न हो.”

BAPS ने माफी मांगी लेकिन CGT की कही गई पूरी बात को नहीं माना. संस्था ने एक बयान में कहा, “समूह में लोगों की संख्या को देखते हुए यह यात्रा एफिल टावर की मैनेजमेंट टीम के साथ पहले से तय की गई थी. इसे टावर के सामान्य कामकाज शुरू होने के समय रखा गया था, ताकि कर्मचारियों, वहां आने वाले दूसरे लोगों और टावर के रोज के काम में कम से कम परेशानी हो. इसका मकसद कभी भी महिलाओं और पुरुषों के बीच कोई भेद करना नहीं था. अगर कोई ऐसा कह रहा है, तो यह हमारी संस्था या हमारे साथ आए लोगों की सोच को नहीं दिखाता. हमारी जानकारी के मुताबिक, हमारी यात्रा के दौरान किसी भी व्यक्ति या कर्मचारी को किसी भी समय टावर में आने से नहीं रोका गया.”

इसके बावजूद इस मामले को लेकर कई लोगों ने नाराजगी जताई. पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोआर ने इस व्यवस्था को 'गलत' बताया और जांच करने की बात कही.

SETE के अध्यक्ष एरियल वेल ने कहा, “हम पता लगाएंगे कि आखिर क्या हुआ था और इसके बाद जो जरूरी होगा, वह फैसला लेंगे.”

फ्रांस की समानता मंत्री ओरोर बर्ग ने सोशल मीडिया पर लिखा, “फ्रांस में हम महिलाओं से खुद को छिपाने के लिए नहीं कहते.”

हालांकि, अब तक जिन तीन जांचों की घोषणा की गई है, उनमें से कोई भी आपराधिक या कोर्ट से जुड़ी जांच नहीं है. 8 सितंबर तक श्रम विभाग में कोई मामला या भेदभाव की कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई थी.

हालांकि फ्रांस के श्रम कानून के जानकारों ने बताया कि इस मामले में कोड द्यु त्रवाय यानी फ्रांस के श्रम कानून के तहत जांच हो सकती है. इसके अनुच्छेद L.1132-1 के तहत किसी कर्मचारी को उसके लिंग की वजह से काम से हटाना, सजा देना या उसके साथ भेदभाव करना मना है. इसमें किसी कर्मचारी को काम देने से जुड़े फैसले भी शामिल हैं. अनुच्छेद L.1142-1 के तहत भी किसी कर्मचारी को काम देने या उसका पद तय करने में उसके लिंग को आधार नहीं बनाया जा सकता.

इस मामले में कानूनी जानकारों का कहना है कि कोई कंपनी अपने ग्राहक की भेदभाव वाली मांग को शिफ्ट प्लान में शामिल करके उसे सामान्य काम का हिस्सा नहीं बना सकती. यानी अगर SETE ने खुद माना है कि उसने इस मांग को मान लिया था, तो इसके लिए SETE पर भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है. यह BAPS ने ऐसा क्यों किया, उससे अलग मामला है.

स्वामीनारायण संप्रदाय एक वैष्णव धार्मिक आंदोलन है, जो 18वीं सदी की शुरुआत में शुरू हुआ था. इसका मकसद हिंदू सनातन धर्म की मान्यताओं को फिर से मजबूत करना था. BAPS स्वामीनारायण संप्रदाय के तहत आने वाले छह संप्रदायों में से एक है.

BAPS के मंदिर में भगवान स्वामीनारायण मुख्य देवता हैं लेकिन BAPS की मान्यता है कि संप्रदाय की आध्यात्मिक परंपरा उसके उत्तराधिकारी के जरिए आगे चलती रहती है इसलिए संप्रदाय के प्रमुख को बहुत शक्तिशाली माना जाता है और कहा जाता है कि एक करोड़ से ज्यादा अनुयायियों पर उनकी मजबूत पकड़ है. 92 साल के महंत स्वामी महाराज इस संप्रदाय के छठे और मौजूदा प्रमुख हैं.

दुनिया भर में पहचान रखने के बावजूद महिलाओं को लेकर BAPS की अपनी अलग धार्मिक मान्यता है. दुनिया भर में इसके 800 से ज्यादा संत हैं. वे सिर्फ साधु का जीवन ही नहीं जीते, बल्कि महिलाओं से किसी भी तरह की बातचीत करने से भी बचते हैं. वे महिलाओं से दूर रहकर भी उनसे बात नहीं करते और ईमेल जैसे माध्यम से भी बातचीत करने से बचते हैं. BAPS के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, “यह स्वामीनारायण संप्रदाय की मुख्य मान्यताओं में से एक है. भगवान ने कहा था कि कंचन और कामिनी यानी पैसा और महिलाएं कर्म के रास्ते में रुकावट हैं.”

BAPS की स्थापना 1907 में शास्त्रीजी महाराज ने की थी. इसकी शुरुआत वेदों के सिद्धांतों और रोजमर्रा की जिंदगी में आध्यात्मिक सोच को अपनाने के आधार पर हुई थी. संस्था का दावा है कि दुनिया भर में उसके 10 लाख से ज्यादा सदस्य और 80,000 स्वयंसेवक हैं. इसके अलावा, उसके 1,550 से ज्यादा मंदिर, 5,025 केंद्र और हर हफ्ते होने वाली 17,000 सभाएं हैं. BAPS के कुछ प्रसिद्ध मंदिर रॉबिन्सविल (न्यू जर्सी), नई दिल्ली, गांधीनगर, लंदन, ह्यूस्टन, शिकागो, अटलांटा, टोरंटो, लॉस एंजिलिस, अबू धाबी और नैरोबी में हैं. सिडनी और जोहान्सबर्ग में भी मंदिर बनाने की तैयारी चल रही है.

2021 में फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) ने न्यू जर्सी में BAPS के मंदिर की निर्माण वाली जगह पर छापा मारा था. इसके बाद ज्यादातर भारत से आए दलित मजदूरों ने आरोप लगाया था कि उन्हें सुरक्षा वाले एक परिसर में बंद करके रखा गया, उनके पासपोर्ट ले लिए गए और उन्हें बहुत कम मजदूरी दी गई.

दुनिया भर में BAPS के अनुयायी अपनी संस्था के प्रति मजबूत वफादारी के लिए जाने जाते हैं. इसकी एक वजह उसकी आर्थिक ताकत और दुनिया के ताकतवर राजनीतिक लोगों के बीच उसकी पहुंच भी मानी जाती है. पिछले कई दशकों से, खासकर गुजरात में, अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता स्थानीय स्वामीनारायण संप्रदाय का आशीर्वाद लेते रहे हैं.

हालांकि BAPS खुद को राजनीति से दूर रखने वाला संगठन बताता है लेकिन अपनी पसंद के उम्मीदवारों को समर्थन देने की उसकी भूमिका किसी से छिपी नहीं है. इस संप्रदाय के अनुयायियों में पाटीदार समुदाय के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है, हालांकि इसमें दूसरे समुदायों के लोग भी शामिल हैं.

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