इज्राएल में बहुमत का संकट! नेतन्याहू और आइजेनकोट के सामने क्या है रास्ता?

93 फीसदी वोटों की गिनती के बाद भी दोनों खेमे 61 सीटों के जादुई आंकड़े से दूर हैं. अब डाक मतपत्रों की गिनती, छोटी पार्टियों की भूमिका और गठबंधन का जोड़-तोड़ तय करेगा कि अगली सरकार किसकी होगी

Likud and Yashar
बेंजामिन नेतन्याहू और गादी आइजेनकोट (एआइ इमेज)

इज्राएल में चुनाव हो गया है लेकिन असल कहानी अब शुरू हुई है. 1948 में अस्तित्व में आने के बाद से इस देश में कभी किसी एक पार्टी की सरकार नहीं बनी. 120 सीटों वाली नेसेट का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से होता है और सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है.

7 अक्टूबर 2023 के हमास के नेतृत्व वाले हमलों के बाद 27 अक्टूबर को पहली बार आम चुनाव हुए. 29 अक्टूबर तक के आंकड़ों के अनुसार मतदाताओं ने ऐसा नतीजा दिया है जिसमें कोई भी पक्ष 61 के आंकड़े के करीब नहीं पहुंच पा रहा.

अब सवाल है कि जब किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा तो सरकार कौन बनाएगा.

ताजा गिनती

93 फीसदी वोटों की गिनती हो चुकी है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपने प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट से मामूली बढ़त पर हैं, लेकिन बहुमत से अभी भी दूर हैं. लिकुड और उसके कट्टर दक्षिणपंथी तथा अतिरूढ़िवादी सहयोगी 53 सीटों पर पहुंचते दिख रहे हैं. आइजेनकोट की याशार पार्टी और उनके गठबंधन की तीन दूसरी यहूदी विपक्षी पार्टियां 48 सीटों पर पहुंच सकती हैं. अरब नेतृत्व वाली पार्टियां रिकॉर्ड 19 सीटों पर पहुंचती दिख रही हैं. दोनों नेता कह चुके हैं कि वे सरकार बनाने की कोशिश करेंगे.

ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं. नेतन्याहू बहुमत से 8 सीट दूर हैं, जबकि आइजेनकोट 13 सीट पीछे हैं. कागज पर देखें तो अरब पार्टियों की 19 सीटें आइजेनकोट के पक्ष को 61 से आगे ले जा सकती हैं. लेकिन एक को छोड़कर सभी यहूदी पार्टियां पहले ही कह चुकी हैं कि वे इन पार्टियों के साथ सरकार नहीं बनाएंगी. इसलिए सैद्धांतिक रूप से अरब पार्टियां किंगमेकर हो सकती हैं लेकिन व्यवहार में ऐसा होना मुश्किल है.

गिनती अभी जारी है (रिपोर्ट लिखे जाने तक). गुरुवार 29 अक्टूबर को करीब 4.8 लाख डाक मतपत्रों की गिनती शुरू हुई. इनमें सैनिकों, राजनयिकों, अस्पताल में भर्ती मरीजों और उन लोगों के वोट शामिल हैं जो मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच सके. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में ये वोट अंतिम सीटों के बंटवारे को बदल सकते हैं. अंतिम आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर को आने हैं.

चुनावी अनुमान और प्रदर्शन

नेतन्याहू ने ज्यादातर अनुमानों से बेहतर प्रदर्शन किया है. विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार चुनाव से पहले के आखिरी सर्वेक्षणों में आइजेनकोट के गठबंधन को लगभग दो से छह सीटों की बढ़त दिखाई गई थी. इससे पहले जून में सरकारी प्रसारक KAN ने याशार को 21 और लिकुड को 23 सीटें मिलने का अनुमान लगाया था. गर्मियों के अंत तक एक रिपोर्ट में याशार को करीब 22 फीसदी वोट के साथ लिकुड के 20 फीसदी से आगे बताया गया था. 23 अक्टूबर को जारी सर्वेक्षणों में भी कहा गया था कि कोई भी गठबंधन 61 सीटों तक नहीं पहुंचेगा.

जैसे-जैसे चुनाव की रात आगे बढ़ी, एग्जिट पोल नेतन्याहू की ओर झुकते गए. इज्राएल के चैनल 12 के अपडेटेड पोल में उनके गठबंधन को 52 और आइजेनकोट के गठबंधन को 49 सीटें दी गईं. नेतन्याहू समर्थक चैनल 14  ने उन्हें 60 सीटें मिलने का अनुमान लगाया था. आंशिक आधिकारिक गिनती में 53 सीटें मुख्यधारा के एग्जिट पोल के करीब हैं और उस असाधारण अनुमान से काफी नीचे हैं.

दो मुख्य चेहरे

बेंजामिन नेतन्याहू पिछले तीन दशकों से इज्राएल की राजनीति पर हावी रहे हैं. 1996 के बाद से वे छह चुनाव जीत चुके हैं. उसी साल उन्होंने पहली बार प्रधानमंत्री पद संभाला था. यित्ज़हाक रॉबिन की हत्या के बाद वे इज्राएल के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने थे जिन्हें सीधे जनता ने चुना था. इसके बाद से वे ज्यादातर समय सत्ता में रहे और अब सातवीं बार प्रधानमंत्री बनने की कोशिश कर रहे हैं.

नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के मामलों में मुकदमा चल रहा है, हालांकि इससे जुड़े आरोपों को वे खारिज करते हैं. बहुत से लोग 7 अक्टूबर की सुरक्षा विफलताओं के लिए उनकी सरकार को जिम्मेदार मानते हैं. उनके समर्थक ईरान और हमास के खिलाफ सुरक्षा के मोर्चे पर उनके नेतृत्व को श्रेय देते हैं. दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि वे देश से ज्यादा अपनी राजनीतिक सत्ता बचाने को प्राथमिकता देते हैं.

वहीं 66 वर्षीय गादी आइजेनकोट सैनिक से राजनेता बने हैं. उनका जन्म तिबेरियास में मोरक्को से आए यहूदी प्रवासियों के परिवार में हुआ था. 2015 से 2019 तक वे इज्राएली सेना यानी IDF के 21वें चीफ ऑफ स्टाफ रहे. 2022 में वे बेनी गैंट्ज की नेशनल यूनिटी पार्टी में शामिल हुए और अक्टूबर 2023 में युद्धकालीन सरकार में बिना विभाग वाले मंत्री बने.

जून 2025 में उन्होंने गैंट्ज की पार्टी और नेसेट दोनों छोड़ दिए. उन्होंने इसके पीछे पार्टी में आंतरिक लोकतांत्रिक सुधार लागू न होने को कारण बताया. उसी साल सितंबर में उन्होंने याशार यानी ‘सीधा’ नाम की पार्टी बनाई. 

युद्ध ने उनकी निजी जिंदगी को भी गहराई से प्रभावित किया है. दिसंबर 2023 में उनके बेटे गैल की गजा में मौत हो गई. उन्होंने अपने दो भतीजों को भी खोया. इससे बहुत से इज्राएलियों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ी है.

उन्हें मोरक्को या मिजराही मूल के ऐसे पहले इज्राएली के तौर पर देखा जा रहा है, जिनके पास प्रधानमंत्री बनने का वास्तविक मौका है. उनका एजेंडा सुरक्षा, सरकारी संस्थाओं और सभी के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा पर जोर देता है.

हालांकि राजनीतिक रूप से वे अभी अनुभवहीन हैं और उन्हें ऐसे सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ेगा जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट की पार्टी भी शामिल है. लिकुड ने ऐसे विज्ञापन भी चलाए हैं जिनमें कहा गया है कि आइजेनकोट अरब पार्टियों के बिना सरकार नहीं चला सकते. 

कैसे बनती है सरकार

विचार-विमर्श - नतीजे तय होने के बाद राष्ट्रपति सभी निर्वाचित पार्टियों से मिलते हैं और विचार-विमर्श करते हैं जिसके  बाद वे तय करते हैं कि किस नेता को सरकार बनाने के लिए समर्थन देना चाहते हैं.

पहला मौका -राष्ट्रपति उस नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं जिसे वह बहुमत जुटाने में सबसे सक्षम मानते हैं. आम तौर पर यह सबसे बड़ी पार्टी का नेता होता है लेकिन ऐसा होना जरूरी नहीं. 2009 में राष्ट्रपति शिमोन पेरेज ने नेतन्याहू को पहले सरकार बनाने का मौका दिया था जबकि लिकुड चुनाव में कदीमा से पीछे रही थी.

समय सीमा -जिस नेता को सरकार बनाने का मौका मिलता है, उसके पास अधिकतम 42 दिन होते हैं. अगर वह असफल रहता है तो यह जिम्मेदारी किसी दूसरे नेता को दी जा सकती है.

विश्वास मत -नई सरकार को नेसेट में विश्वास मत हासिल करना होता है.

सबसे ज्यादा सीटें जीतना प्रधानमंत्री बनना तय नहीं करता. 2021 में नफ्ताली बेनेट प्रधानमंत्री बने थे, जबकि उनकी पार्टी ने सिर्फ सात सीटें जीती थीं.  बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए बने 8 दलों के एक बेहद विविध गठबंधन के वे सर्वसम्मति से नेता चुने गए थे.

    बहुमत नहीं मिला तो क्या 

    ऐसी स्थिति में 3 बातें संभव हैं - 

    पहला, कोई नेता 61 से कम सीटों के साथ सरकार चला सकता है और अविश्वास प्रस्ताव में हार से बचने के लिए बाहर से समर्थन ले सकता है. ऐसी सरकार बेहद कमजोर होती है.

    दूसरा, दोनों बड़े खेमे मिलकर सरकार बना सकते हैं. अभी दोनों पक्ष इसे खारिज कर चुके हैं, हालांकि चुनाव के बाद अक्सर राजनीतिक रुख बदलते हैं. इस रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन खुद नेतन्याहू हो सकते हैं.

    तीसरा, अगर कोई भी सरकार बनाने में सफल नहीं होता है तो नेसेट भंग होने के साथ इज्राएल में फिर चुनाव होंगे. तब तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे.

    यह सिर्फ सैद्धांतिक संभावना नहीं है. 2019 से 2022 के बीच इज्राएल में पांच चुनाव हुए क्योंकि पार्टियां सरकार बनाने पर सहमत नहीं हो सकीं. मार्च 2021 के चुनाव के बाद जून में जाकर सरकार बन सकी थी. तब नफ्ताली बेनेट और याइर लैपिड के बीच सत्ता साझा करने का समझौता हुआ था. उस समय भी नेतन्याहू को पहले सरकार बनाने का मौका मिला था लेकिन वे ऐसा करने में नाकाम रहे थे.

    यह चुनाव महत्वपूर्ण क्यों

    नेतन्याहू को बहुमत के लिए आठ और सीटों की जरूरत है. उनके मौजूदा सहयोगी ये सीटें नहीं दे सकते. उन्हें विपक्षी खेमे से किसी नेता या पार्टी के टूटकर साथ आने की जरूरत होगी. इसलिए अंतिम नतीजे और आइजेनकोट के छोटे सहयोगियों की निष्ठा इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है.

    उधर आइज़ेनकोट के लिए रास्ता कठिन है. भले ही डाक मतपत्रों की गिनती उनके पक्ष में जाती है फिर भी उन्हें ऐसा समझौता करना होगा जो वे खुद नहीं चाहते. उन्हें अरब पार्टियों का समर्थन लेना पड़ सकता है या दक्षिणपंथी खेमे से किसी को तोड़ना पड़ सकता है. दोनों ही विकल्प राजनीतिक रूप से उनके लिए नुकसानदेह होंगे.

    वहीं अरब पार्टियों को रिकॉर्ड परिणाम मिला है लेकिन प्रभाव सीमित है. हालांकि 19 सीटों के साथ अल्पमत सरकार को बाहर से समर्थन देना संभव है लेकिन इसकी राजनीतिक कीमत बहुत बड़ी होगी.

    जो भी सरकार आएगी उसे गजा, बंधकों, ईरान और उत्तरी सीमा से जुड़े फैसले लेने होंगे. कार्यवाहक सरकारें फैसले ले सकती हैं लेकिन उनकी वैधता कम होती है और उन्हें कानूनी चुनौतियों का सामना ज्यादा करना पड़ सकता है.

    ऐसे में छोटी पार्टियों की ताकत बढ़ेगी. कुछ सीटें तय कर सकती हैं कि सरकार किसकी बनेगी. अगले कुछ हफ्तों में मंत्रालयों, बजट और अतिरूढ़िवादी यहूदियों के लिए सैन्य सेवा से छूट जैसे मुद्दों पर सौदेबाजी देखने को मिल सकती है.

    इन सबके बीच अमेरिका और इज्राएल के पड़ोसी देश यह देखेंगे कि उन्हें एक स्थिर साझेदार सरकार मिलती है या लंबे समय तक राजनीतिक गतिरोध बना रहता है.

    इज्राएल की राजनीति में पहले भी ऐसा हुआ है कि सब कुछ अटका हुआ दिखने के बाद अचानक कोई रास्ता निकल आया. इस बार दांव बहुत ऊंचे हैं क्योंकि दांव पर सब लगा है, एक ऐसा देश जो युद्ध में है, एक ऐसा प्रधानमंत्री जिस पर मुकदमा चल रहा है और एक ऐसा मतदाता जो बार-बार चुनाव में जा चुका है.

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