सिंधु जल संधि के 66 साल: पाकिस्तान के जल संकट के लिए भारत कितना जिम्मेदार?
सिंधु जल संधि ने पाकिस्तान के लिए पानी की उपलब्धता तय की है लेकिन बढ़ती आबादी, कमजोर जल भंडारण और पुराना सिंचाई ढांचा संकट को गहराते गए

सिंधु जल संधि से 6 नदियों के पानी का बंटवारा तय हुआ था (सांकेतिक तस्वीर)
19 सितंबर को सिंधु जल संधि के 66 साल पूरे हो गए. भारत और पाकिस्तान के बीच यह समझौता युद्धों, सैन्य झड़पों और बार-बार पैदा हुए कूटनीतिक संकटों के बावजूद कायम रहा है. लेकिन अब शायद यह अपने सबसे गंभीर दौर से गुजर रहा है.
19 सितंबर 1960 को कराची में विश्व बैंक की भूमिका के साथ इस संधि पर हस्ताक्षर हुए थे. इसे कभी दो दुश्मन पड़ोसियों के बीच लंबे समय तक चले सहयोग के एक दुर्लभ उदाहरण के तौर पर देखा जाता था.
इसने सिंधु नदी बेसिन की छह प्रमुख नदियों को दोनों देशों के बीच बांटा और आंकड़ों के आदान-प्रदान, तकनीकी बातचीत और विवादों के समाधान के लिए व्यवस्थाएं बनाईं. छह दशक से ज्यादा समय बाद यह समझौता दक्षिण एशिया के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक विवादों में से एक के केंद्र में आ गया है.
संधि के तहत भारत को पूर्वी नदियों- रावी, ब्यास और सतलुज के पानी के इस्तेमाल की पूरी छूट दी गई, जबकि पश्चिमी नदियां- सिंधु, झेलम और चिनाब- मुख्य रूप से पाकिस्तान के हिस्से में गईं. बेसिन में कुल जल प्रवाह का करीब 80 फीसदी हिस्सा इन्हीं पश्चिमी नदियों से आता है.
यह व्यवस्था इसलिए असामान्य थी क्योंकि ऊपरी तटवर्ती देश होने के बावजूद भारत ने पश्चिमी नदियों के इस्तेमाल पर व्यापक सीमाएं स्वीकार कीं, जबकि पाकिस्तान को इस नदी तंत्र के बड़े हिस्से पर प्राथमिकता मिली. हालांकि भारत को संधि के तहत कुछ खास इस्तेमाल की अनुमति भी मिली, जिसमें ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ पनबिजली परियोजनाएं शामिल हैं.
ये ऐसी परियोजनाएं होती हैं जिनमें नदी के प्राकृतिक प्रवाह का इस्तेमाल कर बिजली बनाई जाती है और बड़े पैमाने पर पानी को जलाशय में जमा नहीं किया जाता.
संधि ने जानकारी के आदान-प्रदान, तकनीकी बातचीत और विवादों के समाधान के लिए स्थाई सिंधु आयोग को औपचारिक माध्यम के तौर पर स्थापित किया.
भारत ने 1965 और 1971 के युद्धों और 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान भी संधि का पालन जारी रखा. पूर्ण सैन्य टकराव के दौर में भी नदी के पानी को हथियार नहीं बनाया गया. कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि इस संयम ने पाकिस्तान को अपने जल ढांचे को मजबूत करने के लिए असाधारण रूप से लंबा समय दिया.
इसके बावजूद पाकिस्तान पश्चिमी नदी तंत्र पर काफी हद तक निर्भर रहा, जबकि उसकी आबादी बढ़ती गई और जल भंडारण तथा सिंचाई ढांचा इस बढ़ती जरूरत के साथ तालमेल नहीं बिठा सका. नतीजा यह है कि उसके पास एशिया की प्रमुख नदी प्रणालियों में से एक होने के बावजूद जल असुरक्षा बढ़ती जा रही है.
पाकिस्तान की सबसे बड़ी संरचनात्मक कमजोरियों में से एक जल भंडारण क्षमता है. तरबेला और मंगला जैसे जलाशयों में गाद भरने और पुराने होते ढांचे की समस्या है जबकि नई बड़ी जल भंडारण परियोजनाओं में वित्तीय, राजनीतिक और प्रशासनिक समस्याओं के कारण देरी होती रही है. आबादी बढ़ने के साथ प्रति व्यक्ति जल भंडारण क्षमता पर भी दबाव बढ़ा है.
एक विशेषज्ञ ने कहा, "समस्या सिर्फ सिंधु नदी तंत्र में आने वाले पानी की मात्रा की नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की उस पानी को जमा करने, सुरक्षित रखने और बांटने की क्षमता की भी है."
भारी मानसूनी बारिश के दौरान नदी बेसिन में बड़ी मात्रा में पानी आता है और अंततः अरब सागर में चला जाता है. लेकिन निचले इलाकों में पानी जमा करने की अपर्याप्त क्षमता, पुराने पड़ चुके नहर तंत्र, सीमित आधुनिकीकरण और पानी के कमजोर वितरण तंत्र के कारण पाकिस्तान मानसून के दौरान मिलने वाले अतिरिक्त पानी को भरोसेमंद जल सुरक्षा में पूरी तरह नहीं बदल पाता.
समस्या सिर्फ बाहर से नहीं है. पाकिस्तान के प्रांतों के बीच पानी का बंटवारा लंबे समय से तनाव का कारण रहा है, खासकर पंजाब और सिंध के बीच. इसलिए इस्लामाबाद का जल संकट सिर्फ भारत से जुड़ी बाहरी समस्या नहीं है. यह बुनियादी ढांचे और शासन व्यवस्था से जुड़ी ऐसी चुनौती भी है जो कई पीढ़ियों से जमा होती गई है.
पाकिस्तान पर वित्तीय दबाव ने भी निवेश की क्षमता को सीमित किया है. दियामेर-भाशा और मोहमांद जैसी बड़ी परियोजनाओं में लंबे समय से देरी होती रही है जबकि कर्ज, वित्तीय सीमाओं और दूसरी प्राथमिकताओं के बीच बांधों, जलाशयों और सिंचाई व्यवस्था के आधुनिकीकरण में निवेश धीमा रहा है. भ्रष्टाचार और संसाधनों के दूसरे कामों में इस्तेमाल के आरोपों से भी जल क्षेत्र में निवेश को लेकर सवाल उठे हैं.
सिंधु जल संधि खुद भी पश्चिमी नदियों पर भारत की पनबिजली परियोजनाओं को लेकर लगातार विवाद का विषय बनती गई है. किशनगंगा, रतले, बरसार, सावलकोट और लोअर कलनाई जैसी परियोजनाओं पर पाकिस्तान ने आपत्तियां उठाई हैं और इनके कारण लंबे समय तक विवाद समाधान की प्रक्रियाएं चलती रही हैं.
पाकिस्तान के नजरिए से इन परियोजनाओं को लेकर चिंता नदी के पानी के प्रवाह के समय और उसके प्रबंधन को लेकर है. भारत के नजरिए से बार-बार उठाई जाने वाली आपत्तियों से ऐसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को लेकर अनिश्चितता पैदा हुई है जिन्हें नई दिल्ली संधि के तहत अपने अधिकारों के दायरे में मानता है और जो जम्मू-कश्मीर के ऊर्जा और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं.
जम्मू-कश्मीर में 20,000 मेगावॉट से ज्यादा पनबिजली क्षमता होने का अनुमान है जबकि इसका केवल एक हिस्सा ही विकसित हो पाया है. नदी घाटियों में रहने वाले समुदायों के लिए बुनियादी ढांचे में देरी सिर्फ कूटनीतिक मुद्दा नहीं है. इसका मतलब बिजली, रोजगार, निवेश और आर्थिक विकास में देरी भी हो सकता है.
निर्णायक मोड़ अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद आया, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई. इसके बाद भारत ने घोषणा की कि वह सिंधु जल संधि को स्थगित रख रहा है और इस फैसले को पाकिस्तान के कथित सीमा पार आतंकवाद के समर्थन से जोड़ा.
इस कदम ने संधि के रणनीतिक महत्व को मूल रूप से बदल दिया. छह दशक से ज्यादा समय तक भारत ने जल सहयोग को व्यापक सुरक्षा संबंधों से काफी हद तक अलग रखा था. पहलगाम के बाद नई दिल्ली ने संकेत दिया कि अब दोनों चीजों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता.
पाकिस्तान ने इस फैसले की निंदा की और इसे आक्रामक कार्रवाई तथा अपनी जल सुरक्षा के लिए खतरा बताया. वहीं भारत का तर्क था कि संधि की जिम्मेदारियों को व्यापक सुरक्षा संबंधों से अलग नहीं किया जा सकता.
इसके बाद विवाद इंजीनियरिंग और कूटनीति से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय कानूनी क्षेत्र में भी पहुंच गया है. भारत ने अंतरराष्ट्रीय संधि कानून के तहत ‘मटीरियल ब्रीच’ और परिस्थितियों में बुनियादी बदलाव जैसी अवधारणाओं का हवाला देते हुए तर्क दिया है कि सीमा पार आतंकवाद के दशकों लंबे दौर ने उन राजनीतिक परिस्थितियों को कमजोर कर दिया है जिनके आधार पर यह संधि काम करती रही.
वहीं पाकिस्तान ने भारत की कार्रवाई को ‘वॉटर टेररिज्म’ बताया है और इसे नागरिकों के अस्तित्व के लिए खतरा करार दिया है.
दोनों देशों के अलग-अलग रुख इस संकट की गहराई दिखाते हैं. पाकिस्तान के लिए सिंधु नदी एक ऐसी जीवनरेखा है, जिस पर उसकी कृषि, अर्थव्यवस्था और बड़ी आबादी निर्भर है. भारत के लिए संधि अब ऐसे समझौते का रूप लेती जा रही है जिसकी मूल राजनीतिक परिस्थितियां आज की आर्थिक, जनसांख्यिकीय, ऊर्जा और सुरक्षा जरूरतों से पूरी तरह मेल नहीं खातीं.
1960 के बाद हालात में नाटकीय बदलाव आया है. तब भारत आजादी के बाद का एक नया और अपेक्षाकृत गरीब देश था जिसकी औद्योगिक और ऊर्जा जरूरतें सीमित थीं. पाकिस्तान की आबादी भी आज की तुलना में बहुत कम थी.
आज भारत एक बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था है और उसकी ऊर्जा तथा बुनियादी ढांचे की जरूरतें काफी बढ़ गई हैं. वहीं जम्मू-कश्मीर की विकास संबंधी जरूरतें भी महत्वपूर्ण हैं. दूसरी ओर पाकिस्तान तेजी से बढ़ती आबादी, जलवायु संबंधी दबाव, प्रति व्यक्ति पानी की घटती उपलब्धता और लंबे समय से चली आ रही बुनियादी ढांचे की समस्याओं से जूझ रहा है.
ऐसे में 1960 के उपमहाद्वीप के लिए बनाई गई जल-बंटवारे की व्यवस्था 2026 की वास्तविकताओं के सामने परखी जा रही है.
इसका गहरा सबक यह है कि पाकिस्तान की कमजोरी अचानक पैदा नहीं हुई. संधि ने पश्चिमी नदियों तक पहुंच को लेकर काफी हद तक निश्चितता दी लेकिन इस निश्चितता के साथ जल भंडारण, सिंचाई की दक्षता, जल संरक्षण और जलवायु के अनुरूप तैयारी में पर्याप्त निवेश नहीं हुआ.
एक संधि पानी तक पहुंच की गारंटी दे सकती है लेकिन यह गारंटी नहीं दे सकती कि कोई देश उस पानी का कुशल प्रबंधन भी करेगा. वहीं भारत के सामने अपने अधिकारों के अधिक इस्तेमाल और उसके पाकिस्तान पर पड़ने वाले असर तथा क्षेत्रीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है.
कभी सिंधु जल संधि ने यह दिखाया था कि भारत और पाकिस्तान अपने सबसे गंभीर मतभेदों को अलग रखते हुए युद्ध के दौरान भी सहयोग जारी रख सकते हैं. आज संधि का संकट इस व्यवस्था की सीमाएं दिखाता है. जब दोनों देशों के व्यापक राजनीतिक रिश्ते टूट चुके हों, तब जल कूटनीति हमेशा के लिए भू-राजनीति से अलग नहीं रह सकती.
संधि की 66वीं वर्षगांठ पर अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि यह भारत-पाकिस्तान के एक और संकट से बच पाएगी या नहीं. सवाल यह है कि 1960 में तैयार किया गया ढांचा क्या आज की पूरी तरह बदली हुई रणनीतिक, आर्थिक, जनसांख्यिकीय और जलवायु परिस्थितियों में भी काम कर सकता है.
भविष्य के किसी भी समझौते में सिर्फ नदियों के बंटवारे का सवाल नहीं होगा. इसमें पाकिस्तान की घरेलू जल प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत करना, भारत के लिए बुनियादी ढांचे में ज्यादा लचीलापन, विवादों के समाधान की ज्यादा स्पष्ट व्यवस्था और सबसे बढ़कर ऐसा राजनीतिक माहौल बनाना शामिल होगा, जिसमें सहयोग एक बार फिर टकराव से ज्यादा महत्वपूर्ण हो.