एक्शन, स्वैग के बावजूद यश की ‘टॉक्सिक’ बोझिल क्यों है?
यश की एक्शन इमेज पर जरूरत से ज्यादा निर्भर ‘टॉक्सिक’ में कहानी कमजोर पड़ जाती है और हिंसा-ट्रॉमा का अतिरेक फिल्म को बोझिल बना देता है

'टॉक्सिक' के एक सीन में यश
इस फिल्म की शुरुआत में रॉकिंग स्टार यश कहते हैं, "यह कोई अमर चित्र कथा की परीकथा नहीं है." दरअसल यह उनकी KGF: Chapter 2 के बाद पहली फिल्म है. इसी फिल्म ने उन्हें पूरे देश में लोकप्रियता दिलाकर उनके करियर की दिशा बदल दी थी.
लेकिन टॉक्सिक में तीन घंटे 15 मिनट तक घटिया डायलॉग, वीभत्स हिंसा और हद से ज्यादा दिखावटी हरकतें देखने के बाद आखिर में एक सीधी-सादी अमर चित्र कथा की कहानी देखने को मन करता है.
एक्शन और स्वैग यश की पर्दे पर बनी छवि का अहम हिस्सा हैं. लेकिन टॉक्सिक में इन दोनों पर इतना ज्यादा जोर दिया गया है कि लगता है कहानी को पूरी तरह भुला दिया गया. KGF फिल्मों की तरह यहां भी कुछ समय बाद यह समझना मुश्किल हो जाता है कि क्या हो रहा है, कहां हो रहा है और इसमें कौन-कौन है.
टॉक्सिक आजादी से पहले के गोवा, मकाऊ, एक सर्कस और कुछ ऐसे बर्फीले इलाकों के बीच घूमती रहती है, जिनकी पहचान साफ नहीं होती. उस दौर का इस्तेमाल सिर्फ फिल्म का पैमाना बड़ा दिखाने के लिए किया गया है.
कहानी के संदर्भ में उसका ज्यादा महत्व नहीं है. बंदूकें, कटे हुए शरीर के अंग, धमाके और तबाही के दृश्य इतने आम हैं कि धीरे-धीरे उनका असर ही खत्म हो जाता है. नतीजा यह कि कोई मरता है और किसी को फर्क नहीं पड़ता.
टॉक्सिक के केंद्र में राया (यश) और गंगा (नयनतारा) हैं. दोनों भाई-बहन का बचपन तकलीफों और मुश्किलों से भरा रहा है. उनकी ‘उदास आंखों’ से यह साफ भी नजर आता है. ये शब्द कियारा आडवाणी के किरदार नादिया के हैं.
वह फेस रीडर नहीं बल्कि सर्कस में करतब दिखाने वाली लड़की है. टॉक्सिक में नजर आने वाली अभिनेत्रियों की लंबी सूची में कियारा को 'फायर-स्टार्टर' बनने का मौका मिला है. उनके किरदार का एक साफ मकसद है: राया के दिल और दिमाग को उलझा देना.
और वह इसमें कामयाब भी होती है. एंटी-हीरो पहली नजर में ही उस पर मोहित हो जाता है. तारा सुतारिया का ‘सल्वाडोर की बेटी’ वाला किरदार पीछे छूट जाता है. वह रिश्ता सिर्फ कारोबारी साझेदारी को बनाए रखने के लिए चलता है. गंगा किनारे खड़ी गंभीरता से देखती रहती है कि उसका भाई नादिया में खोता जा रहा है. दोनों की गर्मजोशी भरी प्रेम कहानी को ‘तबाही’ गाने में दिखाया गया है.
यहां प्यार तबाही का जरिया है. ‘तबाही’ गाने का नाम ही इसका संकेत देता है. लेखक और निर्देशक गीतू मोहनदास और यश ने प्यार को सिर्फ राया की चाहत और जुनून के जरिए दिखाया है. टॉक्सिक की यही एकमात्र समस्या नहीं है. फिल्म के पहले हिस्से में सेक्स और हिंसा को बार-बार एक साथ पेश किया गया है.
यहां महिलाएं या तो हाशिए पर हैं या फिर हीरो की जरूरतें पूरी करने के लिए मौजूद हैं. इसे एक किरदार की इस बात से बेहतर तरीके से समझा जा सकता है कि राया अपने सामने आने वाली हर महिला को बर्बाद कर देता है. वह कहता है, "क्या प्रचंड इतिहास लिखा है." यह एक तरफ फिल्म की उन तमाम शर्मिंदगी भरी पंक्तियों के बीच बहुत सटीक टिप्पणी है तो दूसरी तरफ ईमानदार आकलन भी.
यहां महिलाएं या तो उथल-पुथल की वजह बनती हैं या हीरो के लिए परेशानी. वे उसे खुद को बर्बाद करने की राह पर धकेलती हैं. लेकिन खुद कमजोर और बेबस नजर आती हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण नादिया है. शुरुआत में वह ऐसी महिला लगती है जो राया को उलझाती है और उसे चुनौती देती है. लेकिन अंत तक वह भी शराब और दुख में डूब जाती है.
हुमा कुरैशी और रुक्मिणी वसंत को ऐसे किरदार मिले हैं, जिनके साथ न्याय नहीं हुआ और जिन्हें आसानी से भुलाया जा सकता है. हालांकि, नयनतारा को कम से कम बड़ी बहन के रूप में दमदार भूमिका निभाने का मौका मिलता है.
एक महिला किरदार एक दुर्लभ डायलॉग में कहती है, "मर्दों के लिए लड़ते-लड़ते हम इंसान से राक्षस बन जाते हैं." यह उन गिने-चुने संवादों में से है जिनमें महिला का नजरिया सामने आता है.
अगर पहला हिस्सा मूल रूप से वासना और थोड़े समय के प्यार की कहानी है तो दूसरा हिस्सा पिता से जुड़ी समस्याओं के कारण पैदा हुई उथल-पुथल और पिता-पुत्र के टूटे रिश्ते पर केंद्रित है. फिर अपराधबोध और बदले की भावना हावी हो जाती है.
इसी से जूझते हुए टॉक्सिक में भावनाओं की कुछ झलकियां दिखाई देती हैं. ‘टिकट’ के किरदार में यश का कम उम्र वाला रूप अपनी अजीब और खौफनाक हरकतों से सबका ध्यान खींचता है. यह मोड़ भावनात्मक रूप से गहरा असर छोड़ सकता था, क्योंकि यह किरदार के भीतर के संघर्ष को छूता है.
लेकिन टॉक्सिक की चीख-पुकार और विजुअल वायलेंस की दुनिया में यह असर चीखों और खून-खराबे के बीच खो जाता है.
टॉक्सिक कई बार ऐसा लगता है जैसे यह किसी खास सनक या फैंटेसी के हिसाब से बनाई गई हो. यश के एक पूरी सेना के जोकरों और नन के भेष में मौजूद श्वेत महिलाओं को मारने वाले सीक्वेंस से लेकर अंतिम संस्कार के दौरान फिल्माए गए एक्शन सेट-पीस तक. टॉक्सिक का ज्यादा सही नाम शायद ‘ट्रॉमेटिक’ होता.