‘उड़ता तीर’ सही निशाने से कितनी दूर?
आयुष्मान खुराना की ‘उड़ता तीर’ एक साथ कॉमेडी, जासूसी और देशभक्ति साधने की कोशिश करती है लेकिन तीनों के बीच तालमेल नहीं बिठा पाती

‘उड़ता तीर’ में आयुष्मान खुराना
‘उड़ता तीर’ के भीतर एक बेहद बेतुकी, लेकिन शानदार फिल्म छिपी हुई है. इसकी कहानी बिलाल अहमद के इर्द-गिर्द घूमती है. वह एक पाकिस्तानी जासूस है जो भारत की खुफिया व्यवस्था में विक्रांत थापर के नाम से घुसपैठ किए हुए है.
एक हादसे में बिलाल की याददाश्त चली जाती है और वह खुद को भारत का वफादार देशभक्त समझने लगता है. फिल्म का मजाक, जो कुछ समय तक बेहद असरदार भी रहता है, यह है कि वह अनजाने में उसी आतंकवादी नेटवर्क को ध्वस्त करने लगता है जिसके लिए वह कभी काम करता था.
फिल्म का पहला हिस्सा इस विचार को पूरे उत्साह के साथ अपनाता है और जमकर बेतुकापन दिखाता है. आयुष्मान खुराना याददाश्त खो चुके जासूस की भूमिका को विश्वसनीय ढंग से निभाते हैं. वहीं, दिवंगत मुकुल देव आतंकवाद और शादी की ख्वाहिशों के बीच उलझे एक जिहादी के किरदार में महफिल लूट लेते हैं.
सुहैल नैय्यर भी एक पाकिस्तानी एजेंट के रूप में उतने ही मनोरंजक हैं जो अपने साथी की अचानक बदली वफादारी से परेशान है. उनका किरदार दर्शकों को कहानी की इस विडंबना से रूबरू कराता है कि भारत में पाकिस्तानी जासूसी नेटवर्क का भंडाफोड़ किसी खुफिया एजेंसी की सूझबूझ से नहीं बल्कि एक जासूस की अनजाने में जागी देशभक्ति के कारण हो रहा है.
फिल्म का हास्य खुला, बेबाक और कई बार बचकाना है. लेकिन ज्यादातर मौकों पर यह इसलिए असर करता है क्योंकि फिल्म अपने बेतुकेपन को पूरी शिद्दत से अपनाती है. पुराने हिंदी गानों का चतुराई से इस्तेमाल हास्य की लय को और बेहतर बनाता है.
कुछ मौकों पर ‘उड़ता तीर’ में ‘द नेकेड गन’ फिल्म सीरीज जैसी अराजक हास्य शैली नजर आती है जहां बेतुकापन ही मजाक बन जाता है. हालांकि फिल्म के सभी हिस्से काम नहीं करते. भारतीय एजेंट की भूमिका में राहुल बोस को बार-बार ऐसी हास्यास्पद स्थितियों का शिकार बनाया जाता है जिनमें उनकी गरिमा भी दांव पर लगती है. इनमें मुर्दाघर में एक शव से जुड़े मजाक और अस्पताल के बिस्तर पर पड़े-पड़े डांस करने का दृश्य भी शामिल है. फिर भी बोस हर दृश्य को पूरे मन से निभाते हैं.
इसके बाद हिंदी फिल्मों की एक जानी-पहचानी बीमारी सामने आती है: दूसरे हिस्से का पतन. जासूसी कॉमेडी के रूप में शुरू हुई फिल्म धीरे-धीरे देशभक्ति से भरी थ्रिलर में बदल जाती है. बिलाल की नई-नई जागी राष्ट्रभक्ति उसे राम मंदिर पर होने वाले आतंकवादी हमले को नाकाम करने के लिए प्रेरित करती है.
इसके साथ ही ‘जय श्री राम’ के नारे, ‘जय हिंद’ का गीत और बार-बार दोहराया जाने वाला यह संदेश कि "मुल्क से बढ़कर कुछ नहीं" कहानी के केंद्र में आ जाते हैं. अगर पटकथा इन दोनों अंदाजों के बीच बेहतर तालमेल बिठा पाती तो फिल्म का यह बदलाव आसानी से स्वीकार किया जा सकता था. इसके बजाय ऐसा लगता है जैसे फिल्म बीच में ही एक पटकथा छोड़कर दूसरी पर चलने लगी हो.
सारा अली खान के किरदार को पर्याप्त विस्तार नहीं दिया गया है इसलिए वह भी इस बदलाव को सहज बनाने में कोई खास मदद नहीं करता. कहानी में उनकी मौजूदगी किसी स्वाभाविक हिस्से के बजाय एक तयशुदा जरूरत पूरी करने की कोशिश लगती है. उन्हें कहानी के भावनात्मक पहलुओं से जोड़ने की फिल्म की कोशिशें भी असर पैदा नहीं कर पातीं.
नतीजा यह है कि फिल्म खुद तय नहीं कर पाती कि उसे पैरोडी बनना है, जासूसी थ्रिलर या राष्ट्रवादी ड्रामा. तीनों बनने की कोशिश में वह किसी भी रूप में पूरी तरह सफल नहीं हो पाती. विडंबना यह है कि जिस तरह की जासूसी फिल्मों के तमाशे का मजाक उड़ाती हुई ‘उड़ता तीर’ शुरू होती है आखिरकार खुद वैसी ही बन जाती है. फर्क बस इतना है कि यहां असर एक्शन या रोमांच से ज्यादा हास्य दृश्यों और नारों के जरिए पैदा करने की कोशिश की जाती है.
यह बात खास तौर पर इसलिए निराश करती है क्योंकि फिल्म की महत्वाकांक्षा सराहनीय है. ‘अंधाधुन’ (2018), ‘आर्टिकल 15’ (2019), ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ (2021) और ‘एन एक्शन हीरो’ (2022) की तरह यह भी आयुष्मान की तयशुदा फॉर्मूले से आगे निकलने की एक और कोशिश है. यह जोखिम साफ नजर आता है. साथ ही एक जानी-पहचानी विधा को नए और ज्यादा चंचल अंदाज में पेश करने की इच्छा भी दिखती है.
दुर्भाग्य से, फिल्म का सबसे मौलिक विचार उसकी अपनी उलझनों के नीचे दबकर रह जाता है. ‘उड़ता तीर’ की शुरुआत एक धारदार हास्य विचार और उसे आगे ले जाने के पर्याप्त आत्मविश्वास के साथ होती है.
लेकिन जासूसी फिल्मों की पैरोडी, राष्ट्रवादी उपदेश और मुख्यधारा की एक्शन फिल्म बनने की उसकी बेताबी के बीच कहीं वह अपने मूल लक्ष्य से भटक जाती है. अंत तक आते-आते जासूस को भले ही अपने मकसद का एहसास हो जाता है लेकिन फिल्म को कभी अपना मकसद दोबारा नहीं मिलता.