'ओह माय डॉग' में इंसानों और कहानी, दोनों पर भारी पड़ते हैं कुत्ते!
अमित राय की 'ओह माय डॉग' में कुत्तों की मासूमियत, वफादारी और फुर्ती खूब भाती है लेकिन उलझी कहानी और लंबा खिंचा ट्रीटमेंट फिल्म का मजा थोड़ा कम कर देते हैं

'ओह माय डॉग' का एक सीन
ऐसा हर दिन नहीं होता कि किसी हिंदी फिल्म में कुत्ते नजर आएं. और ऐसा तो उससे भी कम होता है कि वे इतनी आसानी से इंसानी किरदारों पर भारी पड़ जाएं.
अमित राय की फिल्म 'ओह माय डॉग' को खास बनाती है यह बात कि उन्होंने नस्ल वाले कुत्तों के बजाय स्थानीय 'इंडी' कुत्तों पर फोकस किया है.
इस तरह फिल्म में एक जमीनी जुड़ाव दिखता है. यह ज्यादा अपनी-सी और असली लगती है. फिल्म में अमित राय का अपना पालतू कुत्ता ऑस्कर भी है लेकिन यहां असली शो-स्टीलर है ब्रूनो.
डेढ़ साल का ब्रूनो दौड़ता है, भौंकता है और हमेशा उसके चेहरे पर एक मकसद और दृढ़ता नजर आती है. ब्रूनो सिर्फ अपनी मासूमियत से दर्शकों का दिल जीतने के लिए नहीं है. उसकी फुर्ती और सूंघने की जबरदस्त क्षमता उसे फिल्म का खास किरदार बनाती है.
कहानी दो शहरों में चलती है. असम में एक छोटा लड़का अपू (माही राय) अपने चोरी हुए पालतू मोमो को बचाने के मिशन पर निकलता है. मोमो का किरदार ऑस्कर ने निभाया है. वहीं बिहार में ऑस्कर नाम का एक आवारा कुत्ता है, जिसका किरदार ब्रूनो ने निभाया है.
कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाले युवा उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह प्यार करते हैं. जब एक बच्चा लापता हो जाता है तो ऑस्कर उसकी तलाश में जासूस बन जाता है. इन दोनों कहानियों के जरिए अमित कई मुद्दों को छूते हैं.
इनमें कुत्तों का अपहरण और उनकी मांस के कारोबार के लिए तस्करी करना, साथ ही गरीब और वंचित लोगों को निशाना बनाने वाला गैरकानूनी मानव अंगों का कारोबार शामिल है.
हालांकि इन मुद्दों को 'ओह माय डॉग' जिस उलझे और अधूरे तरीके से कहानी में शामिल करती है, वही इसे थका देने वाली फिल्म बना देता है. दो घंटे 30 मिनट की फिल्म में दोनों कहानियों के बीच बार-बार आना-जाना भी इसे बेहतर नहीं बनाता.
इसके बजाय फिल्म के कुछ छोटे-छोटे पल ज्यादा असर छोड़ते हैं. और बिलाशक इन सभी पलों का केंद्र ब्रूनो ही है. एक सीन में ब्रूनो अपहरणकर्ता की कार का पीछा करने के लिए लगातार दौड़ता रहता है.
इसके बाद पुलिस अधिकारियों समेत इंसानों का उसे पटाखे फोड़कर डराना और लगातार दौड़ाकर थका देना यह याद दिलाता है कि समाज में जानवरों के साथ क्रूरता कितनी सामान्य हो चुकी है. साथ ही यह भी दिखाता है कि लोगों में सहानुभूति की कितनी कमी है. ऐसी क्रूरता को सिर्फ बढ़ावा ही नहीं मिलता, बल्कि कई बार उसे सही भी ठहराया जाता है.
एक दूसरे सीन में हंगरी की बेहतरीन फिल्म 'व्हाइट गॉड' की याद आती है. इसमें एक लड़की अपने पालतू कुत्ते को खोजने के लिए बेताब रहती है. यहां ब्रूनो अपनी आवाज के जरिए सड़क पर रहने वाले कुत्तों की एक पूरी फौज को अपने साथ जोड़ लेता है और कारों में भाग रहे बदमाशों का पीछा करता है.
इनमें से एक कार में लापता बच्चा भी है. 'ओह माय डॉग' का एक बड़ा हिस्सा दर्शकों से यह मानने की उम्मीद करता है कि कहानी में जो कुछ हो रहा है, वह सच हो सकता है. इसकी वजह साफ है. फिल्म दर्शकों को कुत्तों के पक्ष में खड़ा करना चाहती है.
अच्छी नीयत और दो प्यारे कुत्तों के बावजूद 'ओह माय डॉग' उस वक्त निराश करती है, जब पहले से उलझी कहानी में जरूरत से ज्यादा चमत्कार और भगवान वाला एंगल जोड़ दिया जाता है.
इसका मकसद शायद कुत्तों को भगवान की बनाई हुई खास रचना के तौर पर दिखाना है, लेकिन जरूरत से ज्यादा ड्रामा कहानी को खींच देता है और असल कहानी पीछे छूट जाती है.
अपना पालतू जानवर खोना किसी के लिए भी सबसे बुरे सपने जैसा है. उसे परेशान या प्रताड़ित होते देखना उससे भी बुरा है. लेकिन यहां भी अमित राय दर्शकों को कहानी से भावनात्मक रूप से जोड़ने में नाकाम रहते हैं.
फिल्म में वे एक काम जरूर अच्छे से करते हैं. वे बड़ों की नाकामी दिखाते हैं. ये बड़े अगर कुछ करते भी हैं तो बस परेशान करते हैं. वहीं एक बच्चा और कुत्ते हीरो बन जाते हैं.
'ओह माय डॉग' के उन दुर्लभ शांत पलों में, जब ब्रूनो की आंखें सब कुछ कहती हैं, फिल्म वही बात साबित करती है जिसे वह दिखाना चाहती है. बिना शर्त प्यार और वफादारी के मामले में कुत्तों को कोई मात नहीं दे सकता.