एशियन गेम्स के मेडल ने लगाई मीराबाई चनू की महानता मुहर
ओलंपिक, वर्ल्ड चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीत चुकीं मीराबाई चनू ने जापान में सिल्वर जीतकर 28 साल बाद भारत को एशियन गेम्स में वेटलिफ्टिंग का पदक दिलाया

सिल्वर मेडल के साथ मीराबाई चनू
उनका करियर ओलंपिक, वर्ल्ड चैंपियनशिप और कॉमनवेल्थ गेम्स के पदकों से पहले ही सजा-धजा रहा है. लेकिन हैरानी की बात यह थी कि उनके खाते में एशियन गेम्स का पदक नहीं था. 23 सितंबर को जापान में वेटलिफ्टर मीराबाई चनू पूरे आत्मविश्वास में नजर आईं. चेहरे पर मुस्कान थी और वे उस पदक को हासिल करने में जुटी थीं जो लंबे समय से उनसे दूर था.
चनू महिलाओं के 49 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर जीतकर स्वदेश लौटेंगी. इसके साथ ही उन्होंने 28 साल बाद एशियन गेम्स में भारत को वेटलिफ्टिंग का पहला पदक दिलाया. इस सूखे को खत्म करने के लिए बस चोट से मुक्त, शानदार फॉर्म में और आत्मविश्वास से भरी चनू की जरूरत थी.
उन्हें दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वेटलिफ्टरों में शामिल उत्तर कोरिया की री सोंग-गम से हार मिली, जिन्होंने कुल 215 किलोग्राम वजन उठाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया.
पिछले एक दशक से चनू भारत की सबसे बेहतरीन और सबसे निरंतर प्रदर्शन करने वाली वेटलिफ्टर रही हैं. इसका मतलब यह भी रहा कि जब भी वे बड़े मंच पर उतरती हैं तो एक अरब से ज्यादा लोगों की पदक की उम्मीदें उनके साथ होती हैं.
यह उम्मीद दिखाती है कि वे भारत की सबसे भरोसेमंद खिलाड़ियों में शामिल हैं. अपनी मणिपुरी हमवतन मुक्केबाज मैरी कॉम की तरह चनू भी अपने खेल में एक अलग पहचान रखने वाली खिलाड़ी हैं. उन्होंने अपने खेल में एक मानक तय किया है और उनका असर उस मानक से कहीं आगे तक जाता है.
32 साल की चनू भारतीय वेटलिफ्टिंग दल की सबसे उम्रदराज सदस्य हैं. इसके बावजूद वे बार-बार साबित करती हैं कि उम्र सिर्फ एक संख्या है. इसके बजाय उनका अनुभव और परिपक्वता उनके प्रदर्शन को और बेहतर बनाती है.
एशियन गेम्स 2026 में चनू का प्रदर्शन बताता है कि एक खिलाड़ी के तौर पर वे कितनी दृढ़ हैं. स्नैच में बेहद शांत रहते हुए उन्होंने अपने तीनों प्रयास आसानी से पूरे किए. क्लीन एंड जर्क में उन्हें पता था कि वे अपना काम कर चुकी हैं और अपना पहला एशियाई खेल पदक पक्का कर चुकी हैं.
इस एहसास के साथ वह बेहद खुश नजर आईं. ऐसा लगा जैसे लंबे समय से उनके कंधों पर रखा बोझ उतर गया हो. अब उन्हें कुछ साबित करने की जरूरत नहीं थी.
लेकिन चनू का सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है. उन्हें कई बार चोटों का सामना करना पड़ा. इससे उबरने में उन्हें लंबा समय लगा और वापसी के बाद प्रतियोगिताओं में भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा.
उम्मीदों का बोझ भी उन्हें भारी पड़ा. 2016 के रियो ओलंपिक में वे पदक से चूक गई थीं. हाल ही में 2024 के पेरिस ओलंपिक में भी वे दूसरा ओलंपिक पदक सिर्फ एक किलोग्राम से चूक गईं.
लेकिन जब हालात मुश्किल होते हैं तब चनू संकट से निकलकर फिर मजबूती से वापसी करने की क्षमता दिखाती हैं. उनका ओलंपिक सिल्वर, कॉमनवेल्थ गेम्स में तीन गोल्ड और एक सिल्वर तथा वर्ल्ड चैंपियनशिप के कई पदक इसका सबूत हैं.
जापान में एशियन गेम्स का अपना लक्ष्य हासिल करने के बाद चनू के साथ उनके लंबे समय से कोच रहे विजय शर्मा भी हैं. ऐसे में उनसे भारतीय वेटलिफ्टिंग दल के दूसरे सदस्यों को प्रेरित करने की उम्मीद की जा सकती है.
भारत को चनू के कद की दूसरी वेटलिफ्टर देखने में शायद अभी समय लगे लेकिन फिलहाल उम्मीद यही है कि जापान में टीम इंडिया के साथ उनकी मौजूदगी बाकी खिलाड़ियों को प्रेरित करती रहेगी.