'बंटवारा 1947' की नेक नीयत पर भारी पड़ा टीवी सीरियल जैसा ट्रीटमेंट

सनी देओल और राजकुमार संतोषी की 'बंटवारा 1947' विभाजन की त्रासदी और इंसानियत की बात करती है लेकिन कहानी को जरूरत से ज्यादा जोर देकर कहने का अंदाज और कमजोर परफॉर्मेंस फिल्म का असर कम कर देते हैं

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'बंटवारा 1947' के एक सीन में सनी देओल

पीरियड ड्रामा 'बंटवारा 1947' के शुरुआती डायलॉग मौजूदा समय में देश के माहौल से मेल खाते हैं. आजादी की पूर्व संध्या पर एक भीड़ 'भारत माता की जय' के नारे लगाती है. मेरठ के फैक्ट्री मालिक सनी देओल का किरदार सिकंदर मिर्जा इस मौके को लेकर उत्साहित है. वह मिठाइयां बांटता है और जश्न मनाने के लिए आसपास के इलाके को सजाता है.

वह नेहरू जैकेट पहनने वाला ऐसा मुस्लिम है जिसकी आंखों के नीचे काजल नहीं है और सिर पर टोपी भी नहीं. जल्द ही उसे एहसास होता है कि नए राष्ट्र के प्रति उसकी निष्ठा का कोई महत्व नहीं है क्योंकि उसकी वफादारी सिर्फ उसके धर्म से तय की जाती है. 

उसे बेहद झकझोर देने वाले तरीके से एहसास होता है कि अब भारत में मुसलमानों को नहीं चाहा जाता. इसके बाद मजबूरी में ट्रेन के जरिए पलायन होता है.

हिंदी सिनेमा में विभाजन की कहानियां पहले भी खूब आई हैं लेकिन फिल्ममेकर राजकुमार संतोषी की 'बंटवारा 1947' कम अपनाई गई राह पर चलती है. इसकी वजह यह है कि यह असगर वजाहत के लोकप्रिय नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई’ का रूपांतरण है. 

इसमें विभाजन के इस भयावह अध्याय को मुख्य रूप से उन मुसलमानों के नजरिए से देखा गया है जिन्होंने अपनी जान, रोजी-रोटी और घर खो दिए.

सनी देओल की मारधाड़ वाली छवि को यहां भी भुनाया गया है

फिल्म का केंद्रीय किरदार एक ऐसा मुस्लिम है जो अपने आसपास इंसानियत को बिखरते देखने के बावजूद नफरत को खुद पर हावी नहीं होने देता. 

यह संवेदनशील टोन हिंदी सिनेमा में पाकिस्तान से जुड़ी कहानियों में इन दिनों दिखने वाले बदले और अति-राष्ट्रवाद के लोकप्रिय रुझान से बिल्कुल अलग है.

कहानी की मुख्य पात्र दुर्गावती देवी (शबाना आजमी) हैं. राहत शिविर में कई हफ्ते बिताने के बाद मिर्जा और उसका परिवार लाहौर में उन्हें आवंटित 'दुर्गा निवास' नाम की कोठी में पहुंचता है. 

देवी अपना घर छोड़ने से इनकार कर देती हैं क्योंकि उनका बेटा अभी वापस नहीं आया है. वे मिर्जा, उसकी पत्नी और उनके दो बच्चों के साथ रहने को तैयार हैं लेकिन परिवार के लोग भी उनकी मौजूदगी को लेकर आशंकित और चिड़चिड़े रहते हैं.

मिर्जा का परिवार उनसे छुटकारा पाने के तरीके पर विचार करते हुए 'बला' और 'बुढ़िया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है. लेकिन इंसान के दिल में सहानुभूति कब और कैसे जगह बना ले, इसका कोई ठिकाना नहीं. मिर्जा की पत्नी (प्रीति जिंटा) भी मानती है कि ऐसा करना अमानवीय होगा. 

एक ही छत के नीचे दो धर्मों और उनके अलग-अलग तौर-तरीकों के सह-अस्तित्व की संभावना को कहानी में जगह दी जाती है. जब तक कि कुछ बिगड़े हुए लोग धर्म के नाम पर माहौल खराब नहीं कर देते.

कागज पर यह सब आदर्श लगता है. लेकिन संतोषी के ट्रीटमेंट में सनी देओल हैं इसलिए खूब चीख-पुकार और घूंसे हैं- जुबानी भी और शारीरिक भी. यह सब फिल्म के संदेशों को जोर देकर समझाने के लिए है. यह संदेश संतोषी और असगर वजाहत के लिखे ऐसे जोरदार डायलॉग के जरिए बार-बार सामने आते हैं, जो नारों जैसे लगते हैं.

शबाना आजमी अपने संयमित अंदाज के इस फिल्म में किसी दूसरी दुनिया का किरदार लगने लगती हैं

इनमें "मैं वो करूंगा जो मेरा ईमान कहता है", "कोई मजहब बुरा नहीं होता; अच्छा-बुरा आदमी होता है" जैसे डायलॉग शामिल हैं. इस्लाम के असली अर्थ और अच्छा मुस्लिम होने का मतलब समझाने वाले उपदेश भी हैं- "जालिमों को अल्लाह पसंद नहीं करता." 

अफसोस की बात है कि समावेशिता और दो देशों/धर्मों के बीच शांति की अच्छी नीयत वाली यह मुहिम जरूरत से ज्यादा मुखर ट्रीटमेंट और कुछ बनावटी परफॉर्मेंस (खास तौर पर अभिमन्यु सिंह और करण देओल) के कारण अपना असर खो देती है.

यहां इस बात पर काफी कुछ तलाशा जा सकता था कि हिंसा कैसे हिंसा को जन्म देती है, धर्म और राजनीति को मिलाने के क्या खतरे हैं और हिंसा को चुपचाप होते देखने वाले लोग किस तरह उसके सहभागी बन जाते हैं. 

लेकिन अगर अच्छी फिल्ममेकिंग किसी नेक मकसद का साथ न दे तो उसका असर सीमित रह जाता है. ऐसा नहीं है कि 'बंटवारा 1947' आपको भावुक नहीं करेगी या मिर्जा के अपनी 'मां' को बचाने के लिए आगे आने पर आप उसका साथ नहीं देंगे. 

यहां एक फाइट सीक्वेंस में देओल की 'गदर' के तारा सिंह और हैंडपंप उखाड़ने की झलक भी मिलती है. फिल्म सौहार्द और भाईचारे की वकालत भी करती है. लेकिन ये चीजें सोप ओपेरा जैसी कहानी कहने के अंदाज पर भारी नहीं पड़तीं. 

यहां तक कि आजमी की दुर्गा और अली फजल के शायर हबीब अनवर अपने संयमित अंदाज के साथ किसी दूसरी ही दुनिया के किरदार लगते हैं.

'बंटवारा 1947' एक गंभीर नोट पर खत्म होती है. अराजकता और क्रूरता के बीच भी इंसान के भीतर मौजूद अच्छाई पर विश्वास कायम रहता है. 

फिल्म के मकसद की तारीफ की जा सकती है लेकिन उसका जरूरत से ज्यादा सरल, भावुक करने की कोशिश वाला अंदाज और असंतुलित टोन ड्रामा के कुल असर को काफी कमजोर कर देते हैं.

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