वर्ल्ड जूनियर स्क्वैश चैंपियन अनाहत सिंह क्यों हैं 2028 ओलंपिक्स में भारत की सबसे बड़ी उम्मीद?
अनाहत सिंह पहली भारतीय खिलाड़ी हैं जिन्होंने 2010 से लगातार नंबर एक पर कब्जा जमाए मिस्र के खिलाड़ियों का दबदबा खत्म कर स्क्वैश का जूनियर विश्व चैंपियन खिताब अपने नाम किया

साल 2024 की बात है. तब 16 साल की स्क्वैश खिलाड़ी अनाहत सिंह इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में हिस्सा लेने पहुंची थीं. इस कार्यक्रम में उन्होंने एक ऐसी बात कही जिससे उनकी सोच का अंदाजा मिलता है.
उन्होंने कहा था, "जब मैं कोर्ट के अंदर होती हूं तो जीतने के लिए कुछ भी कर सकती हूं." पिछले हफ्ते अनाहत ने वही जज्बा दिखाते हुए ऐसी उपलब्धि हासिल की जिसकी उम्मीद उनसे लंबे समय से की जा रही थी.
वे स्क्वैश की जूनियर विश्व चैंपियन बन गईं. इतना ही नहीं, यह खिताब जीतने वाली वे पहली भारतीय खिलाड़ी बनीं और इसी के साथ उन्होंने साल 2010 से लगातार इस खिताब पर कब्जा जमाए मिस्र के खिलाड़ियों का दबदबा भी खत्म कर दिया.
18 वर्षीय अनाहत इस खेल के इतिहास की सबसे कम उम्र की राष्ट्रीय चैंपियन भी हैं. सितंबर में वे एशियाई खेलों में हिस्सा लेंगी जहां पिछली बार उन्होंने दो कांस्य पदक जीते थे. यही वजह है कि आने वाले ओलंपिक्स में उनसे और बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है.
2028 के लॉस एंजिलिस ओलंपिक्स में हर किसी की नजर अनाहत पर होगी, जहां पहली बार स्क्वैश को ओलंपिक खेलों में शामिल किया जाएगा. भारत को अनाहत से काफी उम्मीदें हैं. अनाहत को भी पूरा भरोसा है. उन्होंने 2024 में इंडिया टुडे से कहा था, "तब मैं अपने स्क्वैश करियर के सर्वश्रेष्ठ दौर में रहूंगी. उम्र के हिसाब से भी यह मेरे लिए फायदेमंद होगा."
खेलों में हमेशा से रुचि रखने वाली अनाहत ने छह साल की उम्र में बैडमिंटन खेलना शुरू किया था. बाद में अपनी बड़ी बहन अमीरा को स्क्वैश खेलते देखकर उन्होंने स्क्वैश भी खेलना शुरू कर दिया.
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में अनाहत ने बताया था, "कुछ साल तक मैं बैडमिंटन और स्क्वैश दोनों खेलती रही. बहन के साथ कुछ टूर्नामेंट में जाने और उनकी ट्रेनिंग देखने के बाद मुझे अच्छा लगने लगा. वहीं से मुझे स्क्वैश पसंद आने लगा."
जब पेशेवर तौर पर एक खेल चुनने की बारी आई तो अनाहत ने स्क्वैश को चुना. उन्होंने कहा, "यह एक शानदार खेल है. जब मैं शांत रहती हूं और कोर्ट पर अपने खेल पर पूरा नियंत्रण रखती हूं तब मैं बेहतर खेलती हूं."
खेल को पूरा समय देने का मतलब यह भी है कि अनाहत को अक्सर ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं के लिए स्कूल छोड़ना पड़ता है. दोस्तों के साथ समय बिताने का मौका भी कम मिलता है. उन्होंने माना कि वह जेन ज़ी की भावना फोमो (फियर ऑफ मिसिंग आउट) को अच्छी तरह समझती हैं.
उन्होंने कहा, "जब मैं इंस्टाग्राम पर दोस्तों की स्टोरी देखती हूं तो वे कभी लंच, कभी डिनर या साथ घूमते नजर आते हैं. मुझे लगता है कि मैं ये सब मिस कर रही हूं और मुझे उनसे ईर्ष्या भी होती है." हालांकि अनाहत के दोस्त मानते हैं कि उनकी जिंदगी उनसे कहीं ज्यादा रोमांचक है.
अनाहत कहती हैं, "टूर्नामेंट की वजह से मुझे दुनिया भर में घूमने का मौका मिलता है. मेरे दोस्त कहते हैं कि तुम बहुत खुशकिस्मत हो क्योंकि तुम्हें पूरी दुनिया घूमने का मौका मिलता है. इसलिए जितना FOMO मुझे उनसे होता है, उतना ही उन्हें भी मुझसे होता है."
कोर्ट के बाहर अनाहत को पेंटिंग करना पसंद है. उन्हें चॉकलेट खाना भी बेहद पसंद है. हालांकि, अनाहत बताती हैं कि चिप्स और कुकीज़ खाने की इच्छा पर वे काबू रखने की कोशिश करती हैं. अनाहत का शरीर काफी दुबला-पतला है. ऐसे में कई लोगों को हैरानी होती है कि उनमें इतनी ताकत और सहनशक्ति कहां से आती है. अनाहत कहती हैं कि सबसे ज्यादा अहम यह है कि आप गेंद को कैसे मारते हैं.
भारतीय स्क्वैश टीम में उन्हें 'गिगल्स' के नाम से बुलाया जाता है क्योंकि उन्हें बहुत हंसने की आदत है. शुरुआत में वे सीनियर खिलाड़ियों के बीच रहने से डरती थीं. उन्होंने कहा, "शुरुआत में थोड़ा डर लगता था लेकिन कुछ टूर्नामेंट के बाद हम सब करीब आ गए और फिर खूब मजा आने लगा."
जूनियर स्तर का सफर पूरा करने के बाद अब अनाहत की कोशिश नीरज चोपड़ा की राह पर चलने की होगी. नीरज भी पहले अंडर-20 विश्व चैंपियन बने थे और बाद में सीनियर स्तर पर भी बड़ी सफलता हासिल की. दिलचस्प बात यह है कि अनाहत को भी JSW Sports का समर्थन मिल रहा है जिसने पहले नीरज चोपड़ा का भी साथ दिया था.
सीनियर रैंकिंग में दुनिया की 20वें नंबर की खिलाड़ी बन चुकीं अनाहत अब अगली चुनौती के लिए तैयार नजर आती हैं. उनका मैच से पहले का रूटीन भी तय है. उन्होंने कहा, "मैच शुरू होने से सिर्फ एक मिनट पहले मैं अपने हेडफोन उतारती हूं और फिर कोर्ट में उतरती हूं." इसके बाद शुरू होता है अनाहत का खेल. खेल प्रेमियों को उम्मीद रहती है कि हर बार इसका अंत उनकी जीत के साथ हो.