27 मई को बिहार की स्पेशल विजिलेंस यूनिट (SVU) के अधिकारियों ने पटना के ठेकेदार रिशु रंजन सिन्हा उर्फ रिशु श्री से जुड़ी कई जगहों पर छापेमारी की. इसके एक दिन बाद यानी 28 मई को उसे गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.
30 मई को कुछ ऐसा हुआ, जिसके कारण यह मामला बिहार के प्रशासनिक इतिहास में एक साधारण भ्रष्टाचार के आरोप से कहीं बड़ा बन गया. दरअसल, बिहार सरकार ने इस मामले में दो सीनियर IAS अधिकारियों अभिलाषा कुमारी शर्मा और योगेश कुमार सागर को निलंबित कर दिया.
सिर्फ 72 घंटों के भीतर, टेंडर में हेराफेरी के आरोपों से शुरू हुई एक जांच ठेकेदारों और इंजीनियरों से होते हुए राज्य की नौकरशाही के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई. 15 अप्रैल को भ्रष्टाचार मुक्त शासन का वादा करते हुए पदभार ग्रहण करने वाले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए यह घटना एक अवसर और चुनौती दोनों साबित हुई.
अवसर यह था कि इस मामले में सख्त कार्रवाई करके सरकार यह दिखा सकती थी कि वह वरिष्ठ अधिकारियों तक पर एक्शन लेने को तैयार है. चुनौती यह है कि टेंडर घोटाले के मामले ने उस प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए, जिसके जरिए बिहार सरकार हर साल हजारों करोड़ रुपए खर्च करती है.
इसीलिए यह मामला सिर्फ एक ठेकेदार, रिशु श्री तक सीमित नहीं है. जांच से सामने आए तथ्य बेहद गंभीर हैं. प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सतर्कता विभाग की जांच में आरोप लगाया गया है कि रिशु श्री से जुड़ी कंपनियां जल संसाधन, स्वास्थ्य, जन स्वास्थ्य इंजीनियरिंग, शहरी विकास, भवन निर्माण, ग्रामीण कार्य और BUIDCO (बिहार शहरी अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड) जैसे कई विभागों से जुड़ी टेंडर हासिल करती थीं.
जांच एजेंसी ने एक ऐसे नेटवर्क का खुलासा किया, जिसमें पहुंच, प्रभाव और सरकारी ठेके इस तरह से आपस में जुड़े हुए थे कि जिससे पसंदीदा लोगों को आसानी से फायदा पहुंचाया जाता था. इस पूरे मामले में अभी जांच जारी है. हालांकि इस मामले की अहमियत इस बात में कम है कि किसी ठेकेदार ने क्या किया या नहीं किया, बल्कि इसमें ज्यादा है कि यह मामला खरीद प्रक्रिया के बारे में क्या खुलासा करता है.
जांचकर्ताओं को संदेह है कि टेंडर संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी पहले से ही प्राप्त कर ली जाती थी. इसके बाद नियम और मानक इस तरह से तैयार किए जाते थे जिससे कुछ चुनिंदा संस्थाओं को लाभ हो और प्रतिस्पर्धा सीमित हो जाए.
अगर ये आरोप साबित हो जाते हैं तो ये सामान्य भ्रष्टाचार के उदाहरण नहीं होंगे जो ठेका देने के बाद होते हैं, बल्कि ये खरीद प्रक्रिया के अंदर ही हेराफेरी की ओर इशारा करेंगे. यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है. ठेका मिल जाने के बाद दी गई रिश्वत एक तरह का भ्रष्टाचार है. हालांकि इससे बड़ी बात एक ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें पात्रता की शर्तें, तकनीकी मापदंड और सूचनाओं तक पहुंच ही बोली लगाने से पहले ही नतीजा तय कर दे. यह कहीं गहरा और गंभीर भ्रष्टाचार है.
'इंजीनियरिंग राज्य'
आधुनिक बिहार कई मायनों में एक इंजीनियरिंग राज्य है. पिछले दो दशकों में इसकी राजनीतिक वैधता का बड़ा हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर पर टिका है. सड़कें, पुल, पेयजल परियोजनाएं, शहरी ढांचा, अस्पताल और सरकारी भवन, ये सभी शासन की मुख्य कहानी का केंद्र रहे हैं.
सरकार के सामने चुनौती यह है कि हर सार्वजनिक निर्माण परियोजना की शुरुआत उन फैसलों की एक लंबी श्रृंखला से होती है जो आम लोगों की नजर से लगभग छिपे रहते हैं. एक इंजीनियर प्लान तैयार करता है. विभाग उसे मंजूरी देता है. पात्रता की शर्तें बनाई जाती हैं.
इस पूरे मामले को देखकर ऐसा लगता है कि टेंडर निकाले जाने से लेकर बोली लगाने, ठेका देने, बिल लगाने, भुगतान जारी करने तक, हर चरण में अधिकारी हेराफेरी कर सकते हैं. यही कारण है कि इस पूरे मामले में जांच इतनी महत्वपूर्ण है. इसने जनता का ध्यान पूरी हो चुकी परियोजना से हटाकर उस सिस्टम की ओर मोड़ दिया है, जिसके जरिए यह प्रोजेक्ट बनकर तैयार होता है.
सवाल केवल यह नहीं है कि नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं. सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक टेंडर प्रक्रिया को शुरू से ही प्रभाव से पर्याप्त रूप से सुरक्षित रखा गया था. चिंता का विषय यह है कि क्या हजारों करोड़ रुपए प्रतिवर्ष का लेन-देन करने वाली टेंडर प्रक्रिया में इतनी बड़ी खामियां मौजूद हैं.
सरकार के भीतर भी इस चिंता को समझा जा रहा है. पिछले महीने, सम्राट चौधरी ने इंजीनियरिंग अनुमानों की जांच के लिए AI के उपयोग के बारे में बात की और दावा किया कि इससे हर प्रोजेक्ट में 5-6 फीसद की कमी आ रही है.
कई टेंडरों की जांच के बीच उनका यह बयान महत्वपूर्ण हो जाता है. अगर AI अनुमानों को 5-6 फीसद तक कम कर सकता है तो वास्तव में इसके क्या मायने हैं? क्या टेंडर में इंजीनियरों ने जानकर लागत में हेराफेरी की है? मानवीय विवेकाधिकार पर यह बड़े सवाल करता है.
मुख्यमंत्री के लिए असली चुनौती
यह मान लेना काफी जल्दबाजी हो जाएगा कि दो IAS अधिकारियों के निलंबन से सिस्टम की खामियां पूरी तरह से दूर हो गई है. सरकार की कार्रवाई से नौकरशाही को जो संदेश गया है, वह साफ है. हालांकि असली और कठिन चुनौती अभी आगे है.
सूत्रों के मुताबिक, विजिलेंस विभाग ED के जरिए साझा किए गए सबूतों पर आगे कैसे बढ़ा जाए, इसकी कानूनी राय मांग रहा है. आने वाले महीनों में जांच का दायरा काफी बढ़ सकता है. इससे कई बड़े सवाल सामने आ सकते हैं. जैसे- आखिर कौन-कौन से टेंडर कथित तौर पर हेराफेरी का शिकार हुईं? क्या पात्रता की शर्तों को कुछ खास बोलीदाताओं के पक्ष में बदला गया? क्या प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने शिकायत की या उन्हें बाहर कर दिया गया?
अब जांच के दायरे में आए ठेकों से कितना सरकारी पैसा खर्च हुआ? क्या परियोजनाओं की लागत जानबूझकर बढ़ाकर कथित कमीशन के सिस्टम से जोड़ा गया? जांचकर्ताओं का मानना है कि ट्रांसफर-पोस्टिंग का नेटवर्क प्रशासनिक फैसलों को प्रभावित करता रहा. अब जांच की बात ये है कि यह नेटवर्क कितना बड़ा और गहरा था?
रिशु श्री की गिरफ्तारी और दो IAS अधिकारियों का निलंबन सिर्फ एक ऐसी घटना है, जिसकी वजह से बिहार को मजबूरन उस मशीनरी के अंदर झांकना पड़ा जो उसकी सड़कें, पुल और सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाती है.

