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RBI और केंद्र सरकार की नई रणनीति विदेशी निवेश को लुभा पाएगी?

भारत का भुगतान संतुलन सुधारने के लिए केंद्र सरकार और RBI ने कई अहम फैसले किए हैं

RBI (फाइल फोटो)
RBI बोर्ड के बैठक की तस्वीर (फाइल फोटो)
अपडेटेड 9 जून , 2026

जून की 5 तारीख को भारत ने  विदेशी पूंजी निवेश को आकर्षिक करने के लिए कई बड़े कदम उठाए. केंद्र सरकार और RBI की ओर से ये कोशिशें ऐसे वक्त में की गई हैं जब देश भुगतान संतुलन (BoP) की समस्या का सामना कर रहा है.

भुगतान संतुलन (BoP) का मतलब देश में आने वाले और बाहर जाने वाले पैसे का अंतर होता है. इस वक्त जितना पैसा देश में आ रहा है, उससे काफी ज्यादा पैसा बाहर जा रहा है. यही कारण है कि भुगतान संतुलन (BoP) दबाव में है.

भुगतान संतुलन (BoP) के दबाव का कारण पश्चिम एशिया में तनाव और पूंजी का भारतीय बाजार से निकलना है. भारत से पैसा दो तरह से विदेश जा रहा है. पहला- बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरिए इन्वेस्ट गए पैसे की वापसी. दूसरा- विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के जरिए भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालना.

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जो अहम कदम उठाए हैं उनमें सरकारी बॉन्ड और इक्विटी (शेयर) में निवेश को बढ़ावा देना भी शामिल है. साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) को बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECBs) लेने के लिए भी प्रोत्साहन दिए गए हैं.

RBI ने तीन से पांच साल की नई FCNR (B) जमा राशि पर हेजिंग लागत खुद वहन करने का भी फैसला किया है. दरअसल, हेजिंग एक तरह का वित्तीय बीमा है जिसका उपयोग संभावित नुकसान से बचने या उसे कम करने के लिए किया जाता है.

ECBs वे वाणिज्यिक ऋण हैं जो भारतीय प्राइवेट और सरकारी कंपनियां विदेशी कर्जदाताओं से उठाती हैं. इनसे भारतीय कंपनियां विदेशी पूंजी प्राप्त करती हैं.

FCNR (B) नॉन रेजिडेंशियल बैंक खाते में जमा विदेशी मुद्रा है. भारतीय बैंक इसे विदेश में रहने वाले भारतीयों (NRI), भारतीय मूल के लोगों और भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को ऑफर करते हैं. इसमें वे अपनी विदेशी कमाई को स्थिर विदेशी मुद्राओं (जैसे डॉलर, यूरो आदि) में भारत में जमा कर सकते हैं.

RBI ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) को बाहरी वाणिज्यिक उधार (ECBs) लेने के लिए 30 सितंबर तक रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा दी है. इससे PSUs को विदेशी मुद्रा में कर्ज लेने की हेजिंग और फंडिंग लागत कम हो जाएगी, जिससे वे विदेश से सस्ता पैसा उठा सकेंगी.

इसके अलावा RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है. केंद्र सरकार ने भी RBI के इन कदमों के साथ मिलकर देश में निवेश आसान बनाने और रुपए को मजबूत करने के उपाय किए हैं. पूंजी बाजार को गहरा बनाने के लिए सरकार ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को सरकारी बॉन्ड्स (G-Secs) में ज्यादा निवेश करने के लिए कई सुधार किए हैं. मुख्य कदमों में ब्याज आय, लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) और शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन (STCG) पर टैक्स छूट शामिल हैं.

इन सभी फैसलों का मुख्य मकसद विदेशी निवेश को आकर्षित करने के साथ ही साथ उसे आसान बनाना भी है. सरकार ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के जरिए सरकारी कंपनियों या बॉन्ड्स आदि (G-Secs) पर कमाए गए ब्याज पर LTCG और विदहोल्डिंग टैक्स (Withholding Tax) को पूरी तरह समाप्त कर दिया है.

इससे पहले विदेशी निवेशकों को 12 महीने से ज्यादा समय तक रखे गए शेयरों और बॉन्ड्स पर 12.5 फीसद LTCG टैक्स और सरकारी बॉन्ड्स पर कमाए गए ब्याज पर 20 फीसद कर देना पड़ता था. केंद्र सरकार ने जुलाई 2024 के केंद्रीय बजट में ज्यादातर संपत्तियों पर LTCG टैक्स की दर को 10 फीसद से बढ़ाकर 12.5 फीसद कर दिया था.

सरकार ने कहा कि ये सुधार स्थिर और लंबी अवधि के विदेशी पूंजी को आकर्षित करने, सरकारी कंपनियों और बॉन्ड्स (G-Secs) के बाजार को गहरा करने और भारत के समग्र ऋण बाजार को मजबूत करने के लिए किए गए हैं. इसके लिए निवेशक को सिर्फ शेयर बाजार नहीं बल्कि अन्य माध्यमों में निवेश के लिए भी आकर्षित किया जा सकेगा.  

सरकार ने एक बयान में कहा, “विदेशी निवेशकों की भागीदारी बढ़ने से इंफ्रास्ट्रक्चर, विनिर्माण, शहरी विकास, जलवायु पहल और अन्य राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए अतिरिक्त फंडिंग का स्रोत मिलेगा. इससे बाजार में लिक्विडिटी और मूल्य निर्धारण बेहतर होगा. सरकार का कर्ज लेने का खर्च कम होगा, वित्तीय बाजार के बेंचमार्क मजबूत होंगे और पूरी अर्थव्यवस्था में मौद्रिक नीति का प्रभाव बेहतर तरीके से पहुंचेगा.”

ये सुधार लंबी अवधि के संस्थागत निवेशकों जैसे पेंशन फंड, बीमा कंपनियों आदि को आकर्षित करने वाले हैं. इससे देश में अधिक स्थिर और निरंतर विदेशी पूंजी आएगा. इन सुधारों से विदेशी मुद्रा फ्लो भी बढ़ेगा और भारत के वित्तीय बाजार और मजबूत व लचीले बनेंगे.

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा, “FCNR (B) और ECBs पर लिए गए इन उपायों तथा सरकार के जरिए बॉन्ड्स और व्यापार समझौतों पर किए गए कदमों से हम आश्वस्त हैं कि भारत का भुगतान संतुलन पहले की तुलना में ज्यादा बेहतर होगा."

नए 15, 30 और 40 साल के गवर्मेंट सिक्योरिटी एसेट (G-Secs) को FAR (Fully Accessible Route) के अंतर्गत लाकर RBI ने विदेशी निवेशकों के लिए लंबी अवधि के बॉन्ड्स में निवेश को पूरी तरह आसान और खुला बना दिया है. स्टेट बैंक के ग्रुप चीफ इकॉनॉमिक एडवाइजर सौम्य कांति घोष के मुताबिक, “इससे G-Secs में FPIs की मांग बढ़ेगी, सरकार का कर्ज लेने का खर्च घटेगा और रुपए को भी सहारा मिलेगा. साथ ही FPIs को लगभग 4,000-5,000 करोड़ रुपए के टैक्स लाभ भी मिलेंगे.”

रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) के जरिए ECB जारी करने में तेजी आएगी. इससे PSUs विदेशी बाजार में प्रतिस्पर्धी दरों पर सस्ता फंड जुटा सकेंगी. यह फैसला वित्त वर्ष 2026 में कुल ECB/FCCB (विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड) फ्लो को भी उछाल देगा जो FY25 के 61.2 अरब डॉलर से घटकर 42.9 अरब डॉलर (लगभग 30 फीसद की गिरावट) रह गया था.

इस बीच, केंद्र सरकार ने कहा है कि वित्त वर्ष 2026 में भारत की GDP वृद्धि 7.7 फीसद रही है जो फरवरी में अनुमानित 7.6 फीसद से थोड़ी ज्यादा है.

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