
द विजय किंगडम जैसे सोशल मीडिया हैंडल्स पर वायरल हो रही 'दफ्तर में एक दिन' वाली तस्वीरें विजय का एक संजीदा व्यक्तित्व सामने लाती हैं. लेकिन तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय एक ऐसे राजनीतिक प्रयोग की कमान संभाल रहे हैं जिसमें कई नए और अनोखे तत्व शामिल हैं.
उनकी तमिलगा वेत्रि कलगम (टीवीके) सरकार पर किसी का एकाधिकार नहीं बल्कि यह यहां दशकों बाद बनी पहली गठबंधन सरकार है. कांग्रेस दशकों बाद सत्ता में लौटी है; दलित-केंद्रित विदुतलै चिरुतैगल काच्चि (वीसीके) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आइयूएमएल) भी नई सरकार का हिस्सा हैं. और उन्हें उनके कद के हिसाब से ही मंत्रालय दिए गए हैं.
कसर बस इतनी ही रह गई कि इसमें अन्नाद्रमुक से बगावत करने वाले नेताओं को जगह नहीं मिली है. इसके साथ ही, अनाधिकारिक किस्म की भी एक मौजूदगी दिखाई देती है. विजय के प्रशंसक वर्ग से निकलकर टीवीके के कार्यकर्ता बने युवा असल में सुधार के प्रति कुछ ज्यादा ही उत्साहित दिख रहे हैं; यहां तक कि उन्होंने खुद को एक तरह की स्वतंत्र राजनीतिक पुलिस में तब्दील कर लिया है.
सोशल मीडिया पर छाए वीडियो में टीवीके सदस्य अचानक निरीक्षण करते हैं, स्थानीय प्रशासनिक मामलों में दखल देते हैं और एक तरह से समानांतर सत्ता चलाते नजर आते हैं. क्या यह एक सच्ची लेकिन नौसिखिएपन वाली सामाजिक सक्रियता है? या फिर, जैसा कि आलोचक कहते हैं, अचानक सत्ता मिलने से उपजा अतिरेक है? जो भी हो, विजय ने इस तरह के व्यवहार की अभी तक सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की है.
सत्ता के निहितार्थ
उत्साह और विरोधाभास का मेल सीधे-सीधे राजनीति पर भी असर डाल रहा है. लंबे इंतजार के बाद वीसीके के वन्नी अरासु को सामाजिक न्याय मंत्री बनाया गया है, जो आदि द्रविड़ कल्याण और पहाड़ी जनजातियों से जुड़े विभागों को संभालेंगे. आइयूएमल के ए.एम. शाहजहां अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री बनाए गए हैं. कांग्रेस के दो मंत्री—राजेश कुमार और विश्वनाथन—एक अलग ही राह पर दिखते हैं. द्रमुक के साथ वर्षों तक निष्क्रिय और कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका निभाने के बाद अब इस पार्टी को तमिलनाडु की सत्ता में सीधी हिस्सेदारी मिली है. एक तरह से देखा जाए तो यह कदम पार्टी के उन धड़ों की सोच को सही साबित करता है जो द्रमुक के बजाय टीवीके को ही राज्य में भाजपा-विरोधी राजनीति का उभरता केंद्र मान रहे थे.
बहरहाल, इस फैसले में कुछ जोखिम भी छुपे हैं. कांग्रेस ने न सिर्फ अपने एक पुराने सहयोगी को नाराज कर दिया है, बल्कि अब नई सरकार में स्थिरता और गंभीरता लाने की जिम्मेदारी भी उसके कंधों पर आ गई है. जाहिर है, इस महत्वाकांक्षा ने ही द्रमुक के साथ उसके रिश्ते कुछ खास अच्छे नहीं रहने दिए थे. बताया जा रहा है कि वामपंथी दलों, वीसीके और आइयूएमएल के नेताओं ने टीवीके को समर्थन देने से पहले द्रमुक के शीर्ष नेतृत्व के साथ गहन चर्चा की थी. लेकिन, कांग्रेस के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

यही वजह है कि द्रमुक प्रमुख एम.के. स्टालिन ने वन्नी अरासु को तो फोन करके बधाई दी लेकिन कांग्रेस को 'पीठ में छुरा घोंपने' और मौकापरस्त होने की आलोचना का सामना करना पड़ा. खासकर स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने कहा कि कांग्रेस ने वर्षों तक द्रमुक के साथ गठबंधन से चुनावी फायदा उठाया और फिर एक नाजुक मोड़ पर उसका साथ छोड़ने का फैसला किया. जवाब में कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने कहा कि पार्टी हमेशा से शासन में सार्थक भूमिका की हकदार रही है और ''सत्ता में हिस्सेदारी जरूरी है.''
इन सबके बीच बागी अन्नाद्रमुक की गैर-मौजूदगी बहुत कुछ कहती है. सूत्रों के मुताबिक, टीवीके नेतृत्व को 'दलबदलुओं' को शामिल करने में कुछ जोखिम नजर आ रहे थे और उसने जोर दिया कि ऐसे विधायक इस्तीफा दें और टीवीके के चुनाव चिह्न पर फिर से चुनाव लड़ें. लेकिन विधायक इसके लिए तैयार न थे. बागी नेताओं सी.वी. षण्मुगम और एस.पी. वेलुमणि के लिए इससे एक असजह स्थिति बन गई है, जिसे अन्नाद्रमुक महासचिव पलानीस्वामी के लिए फिलहाल जीत माना जा रहा है.
तमिलनाडु में अनेक लोगों को भरोसा है कि शासन में एक पीढ़ीगत बदलाव आएगा; लेकिन कुछ टीवीके के अनुभवहीन होने की बात भी उठाते हैं. यह चिंता राज्यभर में टीवीके के कुछ कार्यकर्ताओं की गतिविधियों से और भी ज्यादा बढ़ गई है जो तथाकथित 'कैमरा इंस्पेक्शन' यानी सरकारी उपक्रमों का अचानक दौरा करने और उस पूरी प्रक्रिया को रिकॉर्ड करने में जुटे हैं. एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ''वे पहली बार सत्ता में आए हैं, और यह बात साफ दिखती भी है. अगर सीएम विजय साफ-सुथरा शासन देने को लेकर गंभीर हैं तो उन्हें इन कार्यकर्ताओं पर लगाम कसनी चाहिए.''

