scorecardresearch

हिरासत में क्यों मरे? बताइए तो सही

हिरासत में मौत के मामलों की जांच की अनिवार्य प्रक्रिया को झारखंड सरकार ने धता बताया, मगर हाइकोर्ट ने ऐसे 262 मामलों में नए सिरे से जांच के आदेश दिए

सख्ती हिरासत में मौतों पर झारखंड हाइकोर्ट का कड़ा रुख
अपडेटेड 9 जून , 2026

झारखंड एक ऐसा राज्य है, जहां बीते आठ साल में हर सातवें दिन एक व्यक्ति की मौत पुलिस या न्यायिक हिरासत में हो रही है. देवघर जिले के दुधानी गांव के मेराज अंसारी को बीते साल 22 मई को पुलिस ने हिरासत में लिया. उन पर साइबर ठगी का आरोप था. पूछताछ के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ी. पुलिस इलाज के लिए देवघर सदर अस्पताल ले गई, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस की पिटाई से उसकी मौत हुई है, वहीं पुलिस का कहना था कि मेराज पहले से बीमार था और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. इसी तरह 2015 में धनबाद के धनूहीड इलाके से उमेश सिंह नाम के व्यक्ति को चोरी के आरोप में पुलिस ने हिरासत में लिया. जब उमेश सिंह अगली सुबह घर नहीं लौटे तो उसके परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की.

धनुडीह जोरिया के पास उमेश सिंह का शव मिला. तब शरीर पर चोट के कई निशान पाए गए थे. साथ ही मृतक की कमीज पुलिस स्टेशन के लॉकअप में मिलने की बात सामने आई थी. 

साल 2018 से लेकर मार्च, 2026 तक कुल 427 लोगों की मौत पुलिस या न्यायिक हिरासत में हुई. इसे देखते हुए धनबाद सिविल कोर्ट के वकील शादाब अंसारी ने साल 2022 में झारखंड हाइकोर्ट में जनहित याचिका दायर की. नियमत: दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी की धारा 176/बीएनएसएस) के तहत, हिरासत में हुई हर मौत की जांच अनिवार्य रूप से न्यायिक मजिस्ट्रेट से कराई जानी चाहिए. लेकिन पीआइएल की सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार की ओर से जो जानकारी दी गई, वह काफी चौंकाने वाली थी.

सरकार ने कोर्ट को बताया कि 2018 से 2026 तक झारखंड में कुल 427 मामले सामने आए. इनमें से 262 मामलों में न्यायिक जांच ही नहीं हुई. यहां तक कि परिजनों को सूचित करना, 24 घंटे के अंदर न्यायिक जांच का आदेश देना, पब्लिक नोटिस जारी करना, इन सभी जरूरी प्रक्रियाओं की महज खानापूर्ति की गई.

अदालत ने इस पर गंभीर चिंता जाहिर की. बीती 14 मई को सुनवाई के दौरान झारखंड हाइकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने न्यायिक हिरासत के दौरान मौत के 262 मामलों में दोबारा जांच के आदेश दे दिए. अदालत ने कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट की जगह कार्यपालक मजिस्ट्रेट से कराई जांच दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1-ए) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 196(2) के तहत अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन है.

हिरासत में मौत और इतनी बड़ी संख्या में केसों की दोबारा जांच का यह आदेश, शायद देश का इकलौता मामला है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि ऐसी जांच में निष्पक्षता पक्की करने के लिए न्यायिक अधिकारियों का होना अनिवार्य है क्योंकि पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के बीच 'भाईचारे' के संबंध निष्पक्ष जांच में बाधा बन सकते हैं. कोर्ट ने यह टिप्पणी क्यों की? इसे समझिए. दरअसल यह पीआइएल साल 2022 से हाइकोर्ट में दर्ज है. मगर चार साल तक राज्य सरकार सुनवाई और जरूरी दस्तावेज को प्रस्तुत करने से बचती रही. सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए इसे 'तुच्छ' और 'भ्रामक' तक बता दिया था. हाइकोर्ट ने फैसले में राज्य सरकार के इस रुख की कड़ी आलोचना की.

अमूमन यह देखा गया है कि 90 फीसद मामलों में न्यायिक हिरासत में उन लोगों की मौत होती है, जो छोटे जुर्म में जेल जाते हैं और बेहद गरीब होते हैं. उनके परिजनों को न तो कानूनी प्रक्रियाओं की जानकारी होती है और न ही पुलिस के खिलाफ न्याय पाने की हिम्मत. जब भी ऐसे मामले आते हैं, स्थानीय स्तर पर पुलिस के दलाल संबंधित पीड़ित परिवार के परिजनों को बहला-फुसलाकर तो कभी डरा-धमका कर पुलिस से न भिड़ने की हिदायत देते हैं. पीआइएल दायर करने वाले मुमताज अंसारी कहते हैं, ''किसी भी अपराध के लिए सजा का प्रावधान तय है.

यह कोर्ट तय करेगा कि कौन अपराधी है और जो अपराधी है उसकी सजा क्या होगी. अजीब बात है कि अपराध के आरोप में एक स्वस्थ व्यक्ति के पुलिस हिरासत में जाने के बाद उसकी लाश क्यों वापस आती है?'' इधर हाइकोर्ट ने राज्य सरकार से सभी मामलों की जांच अगले छह महीने में करने को कहा है. अदालत ने यह भी बताने को कहा है कि दोषियों पर क्या कार्रवाई हुई. इसके अलावा अदालत ने रांची स्थित ज्यूडिशियल एकेडमी को इससे संबंधित एसओपी तैयार करने को भी कहा है.

एक पुलिसकर्मी पर कार्रवाई
बीती 24 मार्च को लोकसभा में दिए लिखित जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बताया कि अप्रैल 2021 से मार्च 2026 के दौरान देश में 806 लोगों की मौत हिरासत (पुलिस और न्यायिक) में हुई है. उसमें झारखंड से 24 लोगों की मौत बताई गई है. राज्य सरकार की तरफ से हाइकोर्ट में पेश किए गए आंकड़ों से ये आंकड़े मेल नहीं खाते. दूसरी बात, यदि पुलिस या न्यायिक हिरासत में मौत के मामलों की जांच के दौरान राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को किसी लोक सेवक की लापरवाही का पता चलता है, तो आयोग संबंधित केंद्रीय या राज्य सरकार के अधिकारियों को दोषी लोक सेवक के खिलाफ अभियोजन की कार्रवाई शुरू करने की सिफारिश करता है.

हैरानी कि इसी अवधि में हिरासत में मौत के मामलों में एनएचआरसी की सिफारिश पर अनुशासनात्मक कार्रवाई से संबंधित केवल एक मामला तमिलनाडु से रिपोर्ट किया गया है. ऐसे में झारखंड हाइकोर्ट के आदेश के अनुसार, झारखंड सरकार अगर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की रिपोर्ट सौंपती है, तो वह देशभर में एक नजीर की तरह होगी. हाइकोर्ट में दायर पीआइएल के वकील शादाब अंसारी कहते हैं, ''इस पीआइएल की आखिरी सुनवाई थी और केस डिसक्लोज हो चुका है. कोर्ट ने अपने प्रशासनिक विभाग को जिम्मेदारी दी है कि वह सरकार से इसका फॉलोअप ले. कोर्ट का जो फॉलोअप मैकेजनिज्म है, उसमें मुझे इस बात की संभावना बहुत कम नजर आती है कि गंभीरता से फॉलोअप लिया जाएगा. व्यक्तिगत तौर पर मैं कोर्ट प्रशासन से इसका फॉलोअप मांगूगा. अगर मिला तो ठीक, नहीं तो कंटेप्ट में जाने का ऑप्शन रहेगा.''

बहरहाल, हाइकोर्ट के ताजा आदेश से भविष्य के लिए एक उम्मीद जरूर बंधी है. अदालत ने हिरासत में मौत और उसकी न्यायिक जांच के लिए एसओपी तय करने के लिए कहा है. अगर इस पर अमल हुआ तो हिरासत में मौत के मामले कम हो सकेंगे. 

Advertisement
Advertisement