रिवॉल्यूशनरी गोअंस पार्टी (आरजीपी) को पूरे गोवा की पहली सच्ची क्षेत्रीय पार्टी के तौर पर देखा जाता था. लेकिन अब इसके सामने वजूद का संकट आ गया है. संकट पार्टी अध्यक्ष मनोज परब और उसके अकेले विधायक वीरेश बोरकर के बीच कलह से पैदा हुआ.
वह भी जब 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए एक साल से भी कम वक्त रह गया है. परब ने 21 मई को अपने पद और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने कहा कि वे पार्टी को संभाल नहीं पाएंगे. लंबे वक्त से भीतर खदबदा रही यह फूट निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई जब परब ने सोशल मीडिया पर एक के बाद एक डाली गई पोस्ट में बोरकर के वफादारों पर हमला बोल दिया. विधायक को कथित पार्टी-विरोधी गतिविधियों के लिए नोटिस भी दिया गया, जिसे उन्होंने अभी तक नजरअंदाज किया है.
इंडिया टुडे से बातचीत में बोरकर ने आरोप लगाया कि प्रतिद्वंद्वी धड़ा आरजीपी को 'खत्म' करना चाहता है. उन्होंने दावा किया कि इसी साल विवादित भूमि परिवर्तन के खिलाफ उनके कामयाब आंदोलन से 'कुछ लोगों के स्वार्थों को चोट' पहुंची.
हालांकि परब ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान किया है लेकिन अटकलें लगाई जा रही हैं कि वे भाजपा में शामिल हो सकते हैं. आम आदमी पार्टी भी उनकी तरफ पींगे बढ़ा रही है. यहां तक कि बोरकर भी कांग्रेस में जाने का गुणा-भाग लगाते बताए जा रहे हैं, हालांकि उन्होंने सफाई दी कि वे 2027 का चुनाव आरजीपी के उम्मीदवार के तौर पर ही लड़ेंगे.
अखिल गोवा 'क्रांति'
आरजीपी 'निज गोअंकर' या धरतीपुत्रों के अधिकारों की हिमायत करते हुए युवाओं की अगुआई में हुए आंदोलन से जन्मी थी. इसके कई संस्थापक नेता इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आइएसी) आंदोलन की जमात से आए. 2021 में राजनैतिक पार्टी के तौर पर पंजीकृत होने के बाद इसने अगले साल गोवा की 40 विधानसभा सीटों में से 38 पर चुनाव लड़ा और उस वक्त 28 बरस के बोरकर की अगुआई में दक्षिण गोवा की सेंट आंद्रे सीट जीती. तब उसने 10 फीसद वोट हासिल किए और भाजपा तथा कांग्रेस के बाद तीसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी.
पूर्व विधायक राधाराव ग्रोसियास के मुताबिक, आरजीपी की जीत से पता चला कि ''पहली बार हिंदू धड़े भी अपना गोअन होना जता रहे हैं'', जो महाराष्ट्रियन पहचान की तरफ झुकी पुरानी क्षेत्रीय पार्टियों के विपरीत था. गोवा विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर युगांक नाइक का कहना है कि आरजीपी दूसरों से अलग इसलिए थी क्योंकि उसने ''बराबर हिस्सों में हिंदू और कैथोलिक वोटों को खींचा और वह भी निचले तबकों के बीच से.''
आरजीपी का खत्म होना विपक्ष के गणित को अच्छा-खासा बदल सकता है. आप और तृणमूल कांग्रेस सरीखी हाशिए की पार्टियों के साथ आरजीपी ने 2022 में कई निर्वाचन क्षेत्रों में सत्ता-विरोधी वोटों को बांट दिया, जिससे भाजपा की जीत में परोक्ष मदद मिली. हाल में उसने जिला पंचायत चुनाव में कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन के साथ जाने से मना कर दिया, जिससे कई सीटों पर विपक्ष को नुक्सान उठाना पड़ा.

