देश की राजधानी में ब्रिटिश राज के जमाने की जितनी संस्थाएं हैं, उनमें दिल्ली जिमखाना क्लब शायद सबसे जाना-पहचाना है. इसकी स्थापना 1913 में ब्रिटिश अफसरों के कुलीन वर्ग की सेवा-टहल करने के लिए हुई थी और तब इसका नाम था इंपीरियल जिमखाना क्लब. आजादी के बाद इसकी सदस्यता धीरे से भारतीय सिविल, न्यायिक और रक्षा सेवाओं के कुलीन हाथों में सौंप दी गई. भोग-विलास में दशक गुजरते गए. मगर अब लुटियंस की दिल्ली में बहुतों को ललचाने वाला यह पता—2, सफदरजंग लेन—वजूद के संकट से घिर गया है.
केंद्र सरकार की तरफ से जारी बेदखली के नोटिस को पहली चुनौती पर सुनवाई दिल्ली हाइकोर्ट ने 26 मई को की. न्यायमूर्ति अवनीश झिंगन ने आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. केंद्र सरकार की तरफ से क्लब को एकमात्र गारंटी यह मिली कि 'वह कानून की प्रक्रिया के बिना कब्जा नहीं करेगी'. लिहाजा केंद्र की तरफ से तय तारीख 5 जून को जबरन बेदखली का अंदेशा तो फिलहाल टल गया.
क्लब के पिछले निर्वाचित निकाय की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सरकार के नोटिस को 'अभिशाप' करार दिया और कहा कि 1928 की मूल लीज डीड का खंड 4 असंवैधानिक है. वह खंड पट्टा देने वाले यानी सरकार को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमीन वापस लेने का अधिकार देता है. उन्होंने अदालत से कहा, ''संविधान प्रभावी होने के बाद अब यह नहीं हो सकता.'' अदालत इस तर्क से बिल्कुल नहीं पसीजी.
टकराव के बीज
केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के भूमि और विकास कार्यालय (एलऐंडडीओ) ने 22 मई को जो नोटिस दिया और जिसमें 5 जून तक परिसर खाली करने को कहा गया, वह इस क्लब की मुश्किलों का महज ताजातरीन अध्याय है. एलऐंडडीओ ने 27.3 एकड़ की इस संपत्ति के अधिग्रहण के लिए जो कारण बताए हैं, उनमें यह भी है कि 'राष्ट्रीय रक्षा बुनियादी ढांचे' और जनसुरक्षा की जरूरतों को मजबूत करने के लिए इसकी जरूरत है. क्लब प्रधानमंत्री आवास 7, लोक कल्याण मार्ग के बगल में स्थित है.
दिल्ली जिमखाना क्लब 2017 से ही खबरों में आता रहा है. केंद्रीय कंपनी मामलों का मंत्रालय (एमसीए) इसके कामकाज पर उंगली उठाने वाला पहला निकाय था. उसने दावा किया कि यह क्लब अपनी प्रबंधक कमेटी में सदस्यता को लेकर हेरफेर और 'परिवारवाद' से ग्रस्त है. एक कुप्रथा क्लब में यह बताई गई कि यहां अनधिकृत 'ग्रीन कार्ड' की व्यवस्था है. इसके तहत सदस्यों के 13 से 21 साल के बच्चों के लिए गैर-सदस्य यूसीपी या यूजर ऑफ क्लब प्रेमाइसेज दर्जा है, जिसमें उन्हें वोट देने का अधिकार छोड़कर क्लब की बाकी हर सुविधा मिलती है और 22 साल का होने पर वे पूर्ण सदस्यता ले सकते हैं. वहीं सामान्य आवेदकों को 30 साल की प्रतीक्षा अवधि और 20 लाख रुपए की रजिस्ट्रेशन फीस का सामना करना पड़ता है, जो वापस भी नहीं की जाती. क्लब ने इसके जरिए 44 करोड़ रुपए जमा कर लिए.
एमसीए ने अप्रैल 2020 में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के जरिए आवेदन दाखिल किया और कंपनी कानून की धारा 241 और 242 (कॉर्पोरेट दमन और कुप्रबंधन से राहत) का हवाला देते हुए क्लब के चुने हुए प्रबंधन को हटाने की मांग की. एनसीएलटी ने यह भी आरोप मढ़ा कि इस क्लब को जमीन खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए दी गई थी मगर ऐसी गतिविधियों पर अपने बजट का तीन फीसद से भी कम खर्च किया. यह भी कि इसका 30 फीसद राजस्व शराब और सिगरेट आदि पर खर्च किया गया.
एनसीएलटी ने चुने गए निकाय को 2022 में बर्खास्त कर किया और उसकी जगह सरकार की तरफ से नियुक्त 15 सदस्यों की समिति गठित कर दी. इसमें दिल्ली भाजपा के महासचिव कुलजीत सिंह चहल, पार्टी प्रवक्ता नलिन कोहली, अफसरशाह, रक्षा दिग्गज और दूसरे लोग शामिल हैं.
उधर, जिमखाना के सदस्यों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं. क्लब की सदस्य रुमनिता मित्तल ने दौलतमंदों से इसे वापस लेने के विचार को हंसी-मजाक में उड़ा दिया और कहा कि यह मिथ है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने इस स्थिति को 'अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण' बताया जिसमें क्लब को बेदखल करने के लिए सरकार को औपनिवेशिक जमाने के लीज क्लॉज का सहारा लेना पड़ रहा है.
क्लब के 14,000 सदस्य और 600 कर्मचारी हैं. कर्मचारियों के भविष्य पर अनिश्चितता तारी हो गई है. इस बीच एलऐंडडीओ ने 47 करोड़ रुपए की बकाया राशि के लिए एक और नोटिस भेजा है, जिसमें बड़ा हिस्सा संशोधित लीज दर का है. वक्त कम होता जा रहा और 113 साल पुरानी इस संस्था के बाहर राज्यसत्ता इंतजार कर रही है, जिसके एक हाथ में पुराने जमाने का कानून है और दूसरे में ताला.

