सत्तर के दशक से अपनी आवाज का जलवा बिखेर रहे देशराज पटेरिया बुंदेलखंडी लोकगीत गाने वाले शीर्ष गायकों में शुमार हैं. इन्हें बुंदेलखंड में लोकगीत सम्राट माना जाता है. पटेरिया ने उस दौर में लोकगीत गाना शुरू किया जब लाउडस्पीकर तक का इंतजाम मुश्किल से होता था. आज उनके नाम सबसे ज्यादा लोकगीत गाने का रिकॉर्ड है. वे इकलौते ऐसे लोकगायक हैं जिनके लोकगीत तीन पीढिय़ां एक साथ गुनगुना रही हैं. उन्होंने गांव की कीर्तन मंडली से आगे निकलकर भजन, हरदौल चरित्र से लेकर बुंदेली बोली में वीररस, शृंगार और देवर-भौजी के चुटीले संवादों को लोकगीतों में पिरोकर अपनी एक अलग पहचान बनाई है. बुंदेलखंड में तो नेताओं के लिए देशराज पटेरिया का कार्यक्रम करवाना भीड़ जुटाने की गारंटी जैसा होता है.
पटेरिया का जन्म 25 जुलाई, 1953 में छतरपुर जिले के नौगांव कस्बे के तिदनी गांव में हुआ था. चार भाइयों और दो बहनों में वे सबसे छोटे हैं. उन्होंने गायन कला के साथ-साथ साइंस के छात्र के रूप में प्रथम श्रेणी हायर सेकंडरी पास की. प्रयाग संगीत समिति से उन्होंने संगीत में प्रभाकर की डिग्री हासिल की, लेकिन पढ़ाई के साथ-साथ वे गायन में कामयाबी की सीढिय़ां चढ़ते चले गए. पटेरिया अपने बड़े भाई मदन मोहन पटेरिया को देखकर संगीत की ओर आकर्षित हुए. मदन मोहन गांव में जगह जगह जाकर कीर्तन करते थे.
इनके साथ ही देशराज ने भी गांव में कीर्तन करना शुरू कर दिया और उन्होंने यहीं से बुंदेली लोकगीतों की राह पकड़ ली. हालांकि, शुरुआती दिन काफी आर्थिक तंगी में बीते. पिता किशोरीलाल किसान और मां विद्या देवी गृहिणी थीं. पटेरिया जब कीर्तन मंडली में थे तब खाने का इंतजाम भी बहुत मुश्किल से हो पाता था. पढ़ाई के बाद स्वास्थ्य विभाग में नौकरी की. दिन में नौकरी और रात को लोकगीत गाते थे. आज की तारीख में पटेरिया सालभर में करीब दो सौ बड़े कार्यक्रम कर लेते हैं और उन्हें पैसा सम्मानजनक मिल जाता है.
देशराज पटेरिया को पूरे बुंदेलखंड में ख्याति उस वक्त मिली जब उन्होंने आकाशवाणी छतरपुर के लिए गाना शुरू किया. 1976 से लगातार वे आकाशवाणी के लिए लोकगीत गायन कर रहे हैं.
पटेरिया ने स्थानीय मंचों पर 1972 से ही जाना शुरू कर दिया था. इसके बाद वे लगातार पसंद किए जाने लगे. 1980 के दशक में उनके लोकगीतों की कैसेट्स भी बाजार में आ गईं जो कई बार तो फिल्मी गीतों पर भी भारी पडऩे लगीं. इसके बाद पटेरिया के लोकगीतों का जादू हर बुंदेलखंडी की जुबान पर दिखने लगा. अश्लील और मसालेदार गायन के लिए चर्चित बुंदेली लोकगीतों के बीच देशराज पटेरिया ही अकेले कलाकार रहे हैं जिन्होंने लोकगीतों में मर्यादा को एक हद तक कायम रखा. उन्होंने आल्हा, हरदौल, ओरछा इतिहास, रामायण के साथ जीजा-साली संवाद से जुड़े हास्य और शृंगार पर खूब लोकगीत गाए हैं.
देशराज के पसंदीदा गीतों में उठौ धना (पत्नी) बोल रऔ मगरे पै कौआ, मोए लगत ऐसौ तोरे आ गए लिबउआ..., चली गोरी मेला खौं साइकिल पै बैठके, जीजा जी चला रए मूंछें दोई ऐंठ के.., नई नई दुलैन सज गई है, एक दिन बोली नार पिया सैं कै गांव तुम्हारौ जरयारौ.. उतै पवारौ जे ढोर बछेरू हमसें न कटहै चारौ.., काफी प्रसिद्ध हुए हैं. इसके साथ ही उनके किसान की लली खेत खलिहान खौं चली और जौनों मोखों बहिन जानकी आंखन नईं दिखानी, तौनों मोखौं ई मैड़े कौ पीनें नइयां पानी खासे पसंद किए गए. बोलियों में दोहरे मायने वाले संवाद खासे लोकप्रिय होते रहे हैं और पटेरिया के द्विअर्थी लोकगीतों को भी लोगों ने हाथों हाथ लिया है.
पटेरिया ने 10,000 से भी ज्यादा लोकगीत गाए हैं और उनके साथ सहयोगी गायिका में सबसे पहले सागर की रामकली रैकवार ने उनका साथ दिया. इसके बाद लक्ष्मी तिवारी और उर्मिला पांडे ने देशराज के साथ कई लोकगीत गाए हैं. उनकी आवाज में आज भी वही मिठास झलकती है. इस उम्र में भी पटेरिया के प्रोग्राम लेने के लिए लंबी वेटिंग है.
वे याद करते हैं, ''जब हमने गाना शुरू किया वह हिंदी फिल्मों में मुकेश के गानों का दौर था. वे ही मेरे आदर्श हैं, लेकिन हमने अपनी लोकल बोली को अपनाकर ही गायनशैली को आगे बढ़ाया है.'' वे आगे जोड़ते हैं, ''बुंदेली लोकगीतों में आदर्श, वीरता और मर्यादा का मिश्रण है. अब लोकगीतों में अश्लीलता का बोलबाला है, लेकिन मैंने कभी भी लोकगायन में मर्यादा की दीवार नहीं लांघी. बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों में आज भी लोकगीत बेहद लोकप्रिय हैं.''
संघर्ष
बहुत गरीबी झेली. दिन में नौकरी और रात में लोकगीत गाए
टर्निंग पॉइंट
आकाशवाणी छतरपुर में गायन का अवसर मिलना
उपलब्धि
इनके कार्यक्रम कराने के लिए अब महीनों की वेटिंग चलती है
सफलता के सूत्र
अथक मेहनत
लोकप्रियता के कारक
बुंदेली में हर तरह के गीत गाए
***
