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क्रांतिकारी कॉकरोच

इस पैरोडी पार्टी ने लाखों फॉलोवर जुटाकर इंटरनेट पर धमाल क्या मचाया, कॉकरोच भारत के युवाओं का वायरल प्रतीक बन गया. इससे जेन ज़ी की बेचैनी के बारे में क्या इशारा मिलता है भला!

the nation cockroach janta party
कॉकरोच पार्टी का पोस्टर
अपडेटेड 9 जून , 2026

- सुनील मेनन

प्रेत भारत को तंग कर रहा है. कैसा प्रेत...क्रांति का? नहीं, बस एक विद्रोही कीड़ा. वह असल तक नहीं है. उसका प्रतिरूप भर है, अनगिनत ऑनलाइन पोस्ट में उकेरा हुआ, जो विद्रोह के एक ठहाके में गणराज्य के दरवाजे पर आ पहुंचा. ठहाका भी अप्रासंगिक, व्यंग्यात्मक और तरुणाई भरा. यह ठीक-ठीक है क्या?

तो, इसका एक पैरोडी नाम है—कॉकरोच जनता पार्टी, जिसका संक्षिप्त नाम है सीजेपी. तो क्या कोई राजनैतिक पार्टी? नहीं, औपचारिक अर्थ में तो नहीं. ताजा जानकारी के मुताबिक, यह उस किस्म की पार्टी ज्यादा है जहां आप चीखते, चिल्लाते और भड़ास निकालते हैं.

इसके छोटे और बंद संस्करण को ऑनलाइन लाफ्टर क्लब कहा जा सकता था. मगर यह खतरनाक ढंग से फैल गया. इस कदर वायरल हो गया कि इसने पलक झपकते ही ठहाकों की मानो महामारी पैदा कर दी.

साफ है कि भारत के नौजवानों केभीतर ज्वालामुखी जैसा कुछ धधक रहा था और हालात ने धक्क-से उसका मुहाना खोल दिया. गनीमत यह कि उसका लावा हास्य से बना था. यह ज्यादा गंभीर नहीं था. या है?

यह इस पर निर्भर करता है कि आप इसे भारत की हंसोड़ नब्ज की सीधी-सादी आजमाइश के तौर पर देखते हैं, या इसे उस राजनीति, समाज और कानून के पेचीदा जाल के भीतर समझते हैं जिसमें इसने जन्म लिया. यही हुआ भी है. दिल्ली हाइकोर्ट में सीनियर एडवोकेट का दर्जा न मिलने से नाराज एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट में प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए.

यह पहली बार नहीं था जब वह अपनी निजी खुन्नस के लिए मुकदमा लड़ रहा था, और जजों के पास—उन्हें थोड़ी रियायत दें तो—चिढ़ने की वजह थी. इसे बेतुका मामला और वक्त की बर्बादी कहकर खारिज करते हुए पीठ ने अपनी झुंझलाहट पूरी तरह जाहिर कर दी.

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) सूर्यकांत ने कहा, ''पूरी दुनिया सीनियर (एडवोकेट) बन जाए पर तुम नहीं. अगर हाइकोर्ट तुम्हें सीनियर का ओहदा दे दे, तो हम उसे रद्द कर देंगे.’’ न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया, ''तुम्हारे पास लडऩे के लिए कोई और मुकदमा नहीं है?’’

फिर इससे जुड़ी टिप्पणियों का मानो बांध ही टूट गया. सीजेआइ ने पूछा, ''समाज में पहले ही व्यवस्था पर हमला करने वाले परजीवी हैं और तुम उनसे हाथ मिलाना चाहते हो?’’ उन्होंने कहा, ''कॉकरोच सरीखे नौजवान हैं, उन्हें रोजगार नहीं मिलता, पेशे में उनकी कोई जगह नहीं है.

उनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया बन जाते हैं, कुछ आरटीआइ एक्टिविस्ट बन जाते हैं, कुछ दूसरे एक्टिविस्ट बन जाते हैं, और वे हर किसी पर हमला करने लगते हैं...’’ डिजिटल मीडिया के शब्दों में कहें तो इसने धमाका कर दिया. चौतरफा सुर्खियों में छाई यह बात आने वाली घटना का मूल घोषणापत्र बन गई.

केवल नौजवानों को ही नहीं लगता कि यह व्यवस्था ही है जो भारत के अभागे और स्वप्नविहीन नौजवानों पर परजीवी की तरह लिपटी है. उनके लिए भविष्य आखिर उतना जगमगाता मालूम नहीं देता जितना सरकारी प्रचार के परचों में दिखता है. मगर रोष और नाराजगी के बजाए उन्होंने इस कलंक को स्वीकार किया और प्रतीक चिह्न की तरह ओढ़ लिया.

दुखी और पश्चाताप से भरे सीजेआइ ने कहा कि उनके शब्दों को गलत समझा गया, उनका आशय बस फर्जी डिग्री वाले थे. तब तक बोस्टन में रहने वाले पीआर पेशेवर युवक और कभी आम आदमी पार्टी (आप) के डिजिटल वॉर रूम के सिपाही रहे अभिजीत दीपके कदम उठा चुके थे.

दीपके ने एक्स पर लिखा, ''बाहर फैले तमाम 'कॉकरोचों’ के लिए नया प्लेटफॉर्म लॉन्च कर रहा हूं. जुड़ना चाहें तो आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें.’’ नीचे यूजर्स को गूगल रजिस्ट्रेशन फॉर्म का रास्ता बताया गया. नाम था 'कॉकरोच जनता पार्टी’ और कहा गया कि जो भी ''बेरोजगार और आलसी है, हमेशा ऑनलाइन रहने वाला, और जिसमें पेशेवर ढंग से भड़ास निकालने की क्षमता है’’, वह जुड़ने का पात्र है.

इसे इतनी जबरदस्त लोकप्रियता मिली कि जिसके लिए राजनैतिक पार्टियां अरबों खर्च कर दें. इंस्टाग्राम पर सीजेपी ने हंगामा मचा दिया. चार दिन में महज 56 पोस्ट के साथ इसके 1.1 करोड़ फॉलोअर हो गए थे. ये भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हैंडल को पार कर गए, जिसके बरसों की डिजिटल गतिविधियों के बाद 18.4 हजार पोस्ट के साथ 87 लाख फॉलोअर बने थे.

फिर यह कांग्रेस के 1.3 करोड़ फॉलोअर्स से भी आगे निकल गया. एक हफ्ते में इसके 2.2 करोड़ फॉलोअर हो गए. साथ ही रचनात्मक आम लोगों का समुदाय फूलने-फलने लगा. वाह-वाही, ठिठोलियों, मजाकिया मीम्स और सत्ता-विरोधी रील की सूनामी आ गई. 'मैंभीकॉकरोच’ हैशटैग सुपरबग की तरह फैल गया.

चुनावी तर्ज के पोस्टर नमूदार होने लगे. इसी तरह पांच-सूत्री घोषणापत्र भी आ गया, जिसमें दलबदलू नेताओं पर 20 साल की पाबंदी लगाने, सेवानिवृत्ति के बाद प्रधान न्यायाधीशों को राज्यसभा की सीट स्वीकार करने से रोकने, 'गोदी मीडिया’ के ऐंकरों के बैंक खातों की जांच करने और संसद में महिलाओं के लिए 50 फीसद सीटें आरक्षित करने की मांग की गई थी.

वे हर जगह से निकलकर आए. कोलकाता के 37 वर्षीय टेक वर्कर सयन सेन कहते हैं, ''जब मुझे पता चला कि सीजेआइ ने क्या कहा है, तो मैंने सीजेपी को फॉलो कर लिया.’’ गुजरात में अमरेली के प्रकृतिवादी और 29 वर्षीय अनुभवी परीक्षक राजन जोशी कहते हैं, ''उनके सारे मुद्दे भारत के युवाओं के मन को छूते हैं.

मुझे लगता है संकट वास्तविक है.’’ अहमदाबाद के 25 वर्षीय कंटेंट क्रिएटर बिस्वरूप गोस्वामी कहते हैं, ''युवाओं को कहीं भी सियासी विमर्श में हिस्सा लेने का मौका नहीं मिलता. जवाबदेह बनाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.’’ यह सब कुछ खुलेआम सार्वजनिक मंचों पर हो रहा था. हास-परिहास के साथ गुस्से का अमूर्त गुबार वह सब कह रहा था जो भारत के नौजवान कहना चाहते थे.

दुनिया भर के मीडिया ने भी ध्यान दिया. रॉयटर, बीबीसी, अल जजीरा, एनबीसी, डॉयचे वेले, सभी पर रिपोर्ट थीं. क्या भारत के 37.1 करोड़ नौजवानों का विशाल दस्ता, जो दुनिया का सबसे बड़ा युवा समूह है, आखिरकार उतना शांत और निश्चल नहीं था? युवा विद्रोह ने पूरे उपमहाद्वीप में कुलांचे भरीं और श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल में सत्ताओं को धूल-धूसरित कर दिया.

युवा भारत दबे-छिपे इशारों में उकसाने के बावजूद कर्तव्यनिष्ठ ढंग से दब्बू और शांत दिखता था. एक हाजिर जवाब शक्चस ने चुटकी लेते हुए कहा, ''दूसरे देशों में जेन-ज़ी है. भारत में जेन ज़ीज़ीज़ीज़ीज़ी है.’’ मगर अब लगता है कि भारत का युवा पूरी तरह जागा हुआ है, शायद थोड़ा जागरूक भी.

महाराष्ट्र के सेलू के एक और प्रतियोगी परीक्षाओं के अभिलाषी और किसान तुकाराम नाटकर कहते हैं, ''अगर यही हालात कायम रहे तो नेपाल की तरह यहां भी युवा विद्रोह हो सकता है.’’ अलबत्ता अभी तक हथियार तो मीम्स ही हैं, मोलोतोव  (देसी बम या पेट्रोल बम) नहीं.

बेरंग दुनिया
अकारण नहीं कि भारत का मशहूर जनसांक्चियकी लाभांश मीम में निराशा निकाल रहा था. अगर जिंदगी की गलियां होर्मुज जलडमरूमध्य से ज्यादा खौफनाक और तंग दिखाई देती हैं तो आप उन्हें दोष नहीं दे सकते. जिस व्यवस्था ने उन्हें जेल की दीवारों की तरह घेर रखा है, वह महत्वाकांक्षा की उड़ान को जमीन पर ला पटकने में माहिर मालूम देती है.

सीजेपी का जन्म तकरीबन उसी वक्त हुआ जब पेपर लीक होने के बाद नीट को रद्द किया जा रहा था. शिक्षा अक्सर घोटाला मालूम पड़ती है या अमीरों की तरफदारी के लिए बनाई गई लगती थी. एआइ और पश्चिम एशियाई संघर्ष के बीच नौकरियों का बाजार ज्यादा निराशाजनक नजर आता है.

राजनीति और सरकार कोई समाधान पेश करते नहीं दिखते. चुनाव इसी व्यवस्था को अंतहीन ढंग से फिर-फिर पैदा करने में दक्ष मालूम देते थे. जहां तक न्यायपालिका की बात है, उसने होनहार, युवा और ईमानदार विरोधियों को वर्षों जेल में रखने और गुरमीत राम रहीम सरीखे गणमान्यों को उदारता से जमानतें बांटने के तरीके खोज लिए थे.

बलात्कार के आरोपी डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख को 26 मई को जब 30 दिनों के पैरोल की मंजूरी दी जा रही थी, जो 2020 के बाद उनकी 16वीं अस्थायी रिहाई थी, तब 10 दिनों की हो चुकी सीजेपी पहले ही मुश्किल का सामना कर रही थी.

मिलते-जुलते नाम रखने से जाहिर था कि भाजपा इसके व्यंग्य के निशाने पर थी. तो भाजपा को इसमें वैसे भी जरा मजा नहीं आया. एक वीडियो में कर्नाटक के भाजपा पदाधिकारियों को कॉकरोचों को एक डिब्बे में पकड़ते और चप्पलों से कुचलते दिखाया गया. वहीं, सरकार ने 'राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं’ का हवाला देते हुए एक्स पर सीजेपी के प्राथमिक अकाउंट को भारत में ब्लॉक करने के लिए आइटी कानून की धारा 69(ए) का सहारा लिया.

अपने एक्स अकाउंट पर दीपके ने बुरी जानकारी दी, ''इंस्टाग्राम पेज हैक कर लिया गया, मेरा निजी इंस्टाग्राम हैक हो गया, ट्विटर अकाउंट रोक दिया गया...’’ उन्हें मौत की धमकियां भी मिलीं. महाराष्ट्र में उनके माता-पिता को पुलिस सुरक्षा दी गई. रोक के खिलाफ वे अदालत में गए, लेकिन उनके शब्द अब भी बेतकल्लुफ थे.

उन्होंने कहा, ''सरकार कॉकरोचों से इतनी डरी हुई क्यों है? यह तानाशाही बर्ताव देखकर भारत के युवाओं की आंखें खुल रही हैं. हमारा अपराध बस इतना है कि हम अपने लिए बेहतर भविष्य की मांग कर रहे थे. मगर आप हमसे इतनी आसानी से पीछा नहीं छुड़ा सकते. हम फिलहाल एक नए घर पर काम कर रहे हैं. कॉकरोच कभी नहीं मरते.’’

पुणे में रहने वाले और राज्य जन सेवा से जुड़े 30 वर्षीय राहुल कावठेकर का कहना है कि सीजेपी को भी 'वैकल्पिक राजनीति का रूप ग्रहण करना चाहिए’. सीजेपी ऐसी किसी महत्वाकांक्षा का दावा नहीं करती. यहां तक कि इसके फॉलोअर भी थोड़े संशय से भरे जान पड़ते हैं.

कोलकाता की युवा शिक्षिका बिदिशा चंद्रा का मानना है, ''यह विरोध और मतभेद के प्रदर्शन की रचनात्मक पहल थी, जो न तो आक्रामक थी और न गैरकानूनी, और इसमें जेल जाने का जोखिम भी नहीं था.’’ मगर, गोस्वामी को लगता है कि सीजेपी 'यह रुझान कायम नहीं रख पाएगी’. सेन का भरोसा तो इतने तक भी नहीं जाता.

वे दावा करते हैं, ''आप किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अपने आप इतने कम समय में लोकप्रिय नहीं बना सकते.’’ दीपके के पिछले जुड़ावों को अपने संदेह का कारण बताते हुए वे कहते हैं, ''युवाओं का असंतोष वास्तविक है, लेकिन इसके पीछे योजना और पैटर्न है.’’ मगर फिर आम आदमी पार्टी खुद इंस्टा पर 19 लाख फॉलोअर्स पर अटकी है.

राजनीति विज्ञानी शुभमय मैत्रा की राय मायूसी भरी है. उन्हें शक है कि सरकार ने ''युवाओं की नाराजगी को बाहर निकलने देने के लिए चतुराई से ऑनलाइन रास्ता तैयार किया.’’ सीजेपी का कॉकरोच असल कीड़े के विपरीत, भले ही आया-गया साबित हो, मगर इसने बिजली की एक कौंध की तरह परिदृश्य को इस तरह जगमगा दिया कि अंधकार ज्यादा साफ दिखाई देने लगा.

भारत के युवा निराशा का सामना अराजक हिंसा से नहीं बल्कि वाक्पटुता और आत्मनिंदक हास-परिहास के साथ कर रहे थे. यह खतरे से ज्यादा उम्मीद का लक्षण है और अच्छा होगा कि भारत उन पर संदेह करने के बजाए उन्हें कामयाब होने दे.

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