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'मां बहन' में हंसी है, गुस्सा है और औरतों के बारे में गढ़ी गई कहानियों का जवाब भी

यह फिल्म मां-बेटी के उस जटिल रिश्ते में उतरती है जिसे मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा ने लगभग अनछुआ छोड़ दिया है, और ऐसा वह अपने अलग और दिलचस्प अंदाज में करती है

Maa Behen
'मां बहन' के एक सीन में माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी और धर्ना दुर्गा
अपडेटेड 9 जून , 2026

डायन, चुड़ैल, वैश्या, छिछोरी, मसाज क्वीन, पति की हत्यारी, रेखा का देखा...  'मां बहन' में रेखा (माधुरी दीक्षित नेने) को सुनने पड़ने वाले तानों और आरोपों की फेहरिस्त खत्म ही नहीं होती. मोहल्ले में उसके कारनामों को लेकर तरह-तरह की कहानियां मशहूर हैं. वे सच हैं या झूठ, इस पर लंबी बहस हो सकती है. 

लेकिन निर्देशक सुरेश त्रिवेणी और लेखिका पूजा तोलानी शुरुआत से ही एक बात साफ कर देते हैं. रेखा एक सिंगल मदर है, जिसने अपनी दो बेटियों जया (तृप्ति डिमरी) और सुषमा (धर्ना दुर्गा) को अकेले पाला है. दिलचस्प बात यह है कि बेटियां भी अपनी मां के बारे में फैली कुछ अफवाहों पर यकीन करती हैं. लेकिन फिल्म इसे तनाव नहीं बल्कि हास्य का स्रोत बनाती है.

शायद मां और बेटी से ज्यादा जटिल रिश्ता कोई नहीं होता. हैरानी की बात है कि मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में इस रिश्ते को बहुत कम टटोला गया है. 'मां बहन' इसी रिश्ते में अपने अनोखे और थोड़े सनकी अंदाज के साथ उतरती है. यहां अविश्वास है, एक-दूसरे पर उंगली उठाना है, चीख-चिल्लाहट है और दोनों तरफ से लगातार शिकायतें हैं.

रेखा सुनती है, बीच-बचाव करती है और कभी-कभी पलटकर जवाब भी देती है. बड़ी बेटी जया (इस रोल में तृप्ति ने शानदार अभिनय किया है) अपनी शादी से दुखी है और घरेलू जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी हुई है. वह अपने भीतर के गुस्से को हिंसक वीडियो गेम खेलकर बाहर निकालती है. वहीं सुषमा को लगातार वेलिडेशन और अटेंशन चाहिए. उसके लिए सोशल मीडिया का सहारा लेती है. सीधे शब्दों में कहें तो ये तीनों एक-दूसरे को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पातीं.

त्रिवेणी और तोलानी दर्शकों को याद दिलाते हैं कि शायद मां और बेटियों के रिश्ते से गहरा और ताकतवर कोई बंधन नहीं होता. वे किसी भी मोड़ पर इन महिलाओं को आदर्श या देवी-समान दिखाने की कोशिश नहीं करते. उल्टा उन्हें जानबूझकर थोड़ा बुरा बनाया गया है. उनके मुंह से तीखे शब्द निकलते हैं और वे खुलकर, बिना किसी झिझक के हंसती हैं.

खासकर माधुरी को यहां के ऊंचे सुर और तेज रफ्तार वाले हास्य के साथ तालमेल बैठाने में थोड़ा वक्त लगता है. फिल्म कई जगह अतिनाटकीयता और फूहड़ता के बीच बहुत महीन रेखा पर चलती है. शुरुआत में सारे मजाक असर नहीं छोड़ पाते. खासकर तब, जब ये तीनों महिलाएं एक पड़ोसी (रवि किशन) की लाश को ठिकाने लगाने के लिए साथ आती हैं.

'मां बहन' अपनी लय पकड़ने में थोड़ा समय लेती है. लेकिन जब पकड़ती है तब बेहद सटीक और जरूरी टिप्पणियां करती है. फिल्म दिखाती है कि पितृसत्ता और औरतों के प्रति दुराग्रह हमारे समाज में कितनी गहराई तक समाए हुए हैं. इतने कि उन्होंने हमारी सोच और नजरिया दोनों को विकृत कर दिया है.

यहां बिना बाजू वाले ब्लाउज विद्रोह की निशानी बन जाते हैं. महिलाओं के बारे में राय बनती हैं और जंगल की आग की तरह फैलती हैं. यह सिर्फ 'उसने कहा-उसने कहा' वाली कहानी नहीं है. बल्कि 'सबने कहा और बार-बार कहा' वाली कहानी है. जब फिल्म अपना फैसला सुनाती है तो पूरे धमाके के साथ सुनाती है. आखिर में तृप्ति और माधुरी दोनों को ऐसे दृश्य मिले हैं, जो लंबे समय से जमा भावनाओं को बाहर निकालने का मौका देते हैं. और दोनों उन दृश्यों में कमाल कर जाती हैं.

सहायक कलाकारों की टोली भी प्रतिभा से भरी हुई है. गीतांजलि कुलकर्णी और शार्दुल ठाकुर (ईब आले ऊ! फेम) दोनों अपने-अपने किरदारों में चमकते हैं. कुलकर्णी लापता पड़ोसी की पत्नी के रोल में शरारती अंदाज से प्रभावित करती हैं. वहीं शार्दुल, जया के अधिकार जताने वाले पति के किरदार में बेहद मनोरंजक हैं जो मानता है कि जया का अस्तित्व सिर्फ उसकी जरूरतें पूरी करने के लिए है. धर्ना भी अपने पहले बड़े किरदार में अनुभवी कलाकारों के बीच मजबूती से खड़ी नजर आती हैं.

मार्गरेट एटवुड की किताब 'द टेस्टामेंट्स' में एक पंक्ति है, 'टीनेज लड़की से ज्यादा ताकतवर कुछ नहीं होता.' 'मां बहन' इस विचार को और आगे बढ़ाती है. यह कहती है कि उस महिला से ज्यादा ताकतवर कुछ नहीं होता जो सब कुछ सहती है और फिर अपने लिए खड़ी भी होती है.

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