भोपाल के बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदलने पर छिड़ी बहस

कार्यकारी परिषद ने स्वतंत्रता सेनानी बरकतुल्लाह भोपाली के नाम पर बने विश्वविद्यालय का नाम बदलकर वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय करने का प्रस्ताव पारित किया है

बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय

मध्य प्रदेश में पहले भी गांवों, कस्बों और इमारतों के नाम बदलने के कई दौर देखे जा चुके हैं. इसका मकसद उन्हें कथित 'इस्लामी पहचान' से मुक्त करना बताया गया. लेकिन पहली बार किसी ऐसे संस्थान का नाम बदलने की कोशिश हो रही है, जिसका नाम किसी मुस्लिम शासक या 'आक्रमणकारी' से जुड़ा नहीं है.

भोपाल स्थित बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद ने मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से संचालित इस संस्थान का नाम बदलकर वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय करने का प्रस्ताव पारित किया है. प्रस्ताव में कहा गया है कि वाग्देवी ज्ञान और वाणी की देवी हैं जबकि राजा भोज ने वर्तमान भोपाल के आसपास के क्षेत्र पर शासन किया था. उस समय उनकी राजधानी धार में थी.

हाल ही में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश के बाद मंदिर घोषित की गई भोजशाला भी धार में स्थित है. हिंदुओं का एक वर्ग मानता है कि वहां वाग्देवी यानी विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर है.

भोपाल में 1970 में स्थापित इस विश्वविद्यालय का नाम बाद में स्वतंत्रता सेनानी बरकतुल्लाह भोपाली के नाम पर रखा गया था. अब इसका नाम बदलने का प्रस्ताव राज्यपाल मंगूभाई पटेल के पास भेजा गया है. विश्वविद्यालय के कुलाधिपति होने के नाते उन्हें इसे मंजूरी देने का अधिकार है.

मध्य प्रदेश में यह पहली बार है जब किसी गैर-शासक मुस्लिम व्यक्ति के नाम पर बने संस्थान का नाम बदला जा रहा है.

तो बरकतुल्लाह भोपाली कौन थे? भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की एक प्रमुख हस्ती रहे भोपाली का जन्म 1854 में भोपाल के इतवारा इलाके में हुआ था. वे गदर आंदोलन से जुड़े थे और 1915 में अफगानिस्तान में स्थापित भारत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री नियुक्त किए गए थे. उसी निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप थे. भोपाली ने व्यापक यात्राएं की थीं. उन्होंने पत्रकार के रूप में भी काम किया था. वे गदर पार्टी के अखबार का संपादन करते थे और इंग्लैंड में शिक्षाविद के रूप में भी कार्यरत रहे.

बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदलने के प्रस्ताव का विपक्षी कांग्रेस ने विरोध किया है. कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI ने राज्यभर में प्रदर्शन किए हैं. कांग्रेस प्रवक्ता अब्बास हाफी ने कहा है, " BJP सरकारों में प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होते हैं और भर्ती घोटाले आम हैं. योग्यता को बढ़ावा देने के बजाय मध्य प्रदेश की BJP सरकार हिंदुओं और मुसलमानों को बांटने वाले फैसले लेती जा रही है."

सत्तारूढ़ BJP और उससे जुड़े संगठनों ने इस कदम का समर्थन किया है. उनका कहना है कि इससे राजा भोज का भोपाल से संबंध और मजबूत होगा तथा इसका आधार इतिहास और संस्कृति में है.

कुछ वर्गों की ओर से भोपाल का नाम बदलकर भोजपाल करने की भी मांग की जा रही है. शहर के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम 2021 में बदलकर रानी कमलापति रेलवे स्टेशन कर दिया गया था. हबीबगंज का नाम नसरुल्लाह खान के बेटे हबीब के नाम पर पड़ा था. नसरुल्लाह, भोपाल की आखिरी शासक बेगम सुल्तान जहां के सबसे बड़े बेटे थे. रानी कमलापति 18वीं सदी में इस क्षेत्र पर शासन करने वाली गोंड राजकुमारी थीं. रेलवे स्टेशन बनाने के लिए जमीन हबीब ने ही दान की थी.

भोपाल स्थित पुराने विधानसभा भवन मिंटो हॉल का नाम बदलकर कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर कर दिया गया था. कुशाभाऊ जनसंघ और बाद में BJP के नेता थे. वे केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मार्गदर्शक माने जाते थे.

भोपाल का हवाई अड्डा पहले से ही राजा भोज के नाम पर है. जिस पर आलोचक कहते रहे हैं कि राजा भोज का नागरिक उड्डयन से किसी प्रकार का संबंध नहीं था. हालांकि बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद विश्वविद्यालय का नाम वाग्देवी और राजा भोज के नाम पर रखने के प्रस्ताव को पास कर चुकी है और अब यह मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास है.

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