सांड़ की आंख-अब परदे पर आग लगाएंगी निशानेबाज दादियां
दुनियाभर में डंका बजाने वाली निशानेबाज चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर का गांव उनका इतना मुरीद है कि लोग इस गांव को ही आम बोलचाल में इसे दादी के गांव के नाम से ही पुकारने लगे हैं. दुनिया में अपने असल किस्से से मशहूर हुईं ये तोमर देवरानी-जेठानी अब दीवाली में सिनेमा के परदे में मचाएंगी धमाका.

बागपत जिले का एक गांव है, जोहड़ी. इस गांव को लोग बोलचाल की भाषा में ''दादी का गांव'' कहकर पुकारते हैं. दरअसल यहां की दो निशानेबाज दादियों ने दुनिया में इस गांव के नाम का ऐसा डंका बजाया कि गांव ही नहीं बल्कि आसपास के लोगों का सिर भी गर्व से ऊंचा हो गया. बस क्या था, लोगों ने इसे दादी का गांव कहकर पुकारना शुरू कर दिया. जब से निशानेबाज दादियों की जिंदगी पर फिल्म बनने की बात शुरू हुई तब से तो गांव के लोग दादी के किस्से सुनाते नहीं थकते. और जब फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ तो मुझे 2015 का वह दिन याद आ गया जब मैंने सुबह से शाम तक दुनियाभर में मशहूर हो चुकी इन दोनों दादियों के साथ वक्त गुजारा था.
इस वक्त 85 साल की चंद्रो तोमर और 80 साल की प्रकाशी तोमर ने उस वक्त निशाना साधना सीखा जब लोग चलने-फिरने के लिए भी किसी दूसरे का हाथ थामते हैं. दुनियाभर में लोग उन्हें निशानेबाज दादियों के नाम से जानते हैं.
अपने सफर के बारे में चंद्रो तोमर हंसते हुए बताती हैं ''मैं तो अपनी पोत्ती सेफाली को सन 2002 में निशाना लगाना सिखवाने गई थी. पड़ोस मे रेंज खुली थी. लड़के निशाना लगा रहे थे. मुझे लगा कि इसमें कौन सी बड़ी बात है. मैंने बंदूक उठाई और मार दिया दस मीटर के टारगेट पर. छर्रा बिल्कुल सटीक लगा. मास्टर (कोच) राजपाल सिंह ताली बजाते हुए मेरे पास आए और कहा दादी आप यहां सीखने आया करो.'' उस वक्त चंद्रो 65 साल की थीं. इस अनोखी निशानेबाजी का किस्सा दूसरे दिन अखबार में क्या निकला, दादी के चर्चे घर-बाहर सब जगह होने लगे. चोरी-छिपे चंद्रो दादी रेंज में जाने लगीं. पंद्रह दिन ही बीते थे कि उन्होंने अपनी देवरानी प्रकाशी तोमर से भी निशानेबाजी सीखने के लिए कहा. अब दोनों जेठानी-देवरानी तड़के उठकर पहले साफ-सफाई, खाना पीना और चारा-सानी करतीं, फिर निकल पड़तीं बंदूक चलाने.
चंद्रो के बगल में बैठी प्रकाशी जोर-जोर से हंसते हुए कहती हैं ''म्हारे घर के मरद कहवें थे कि बुढापे में तम के कारगिल में जाओगी, वहां बंदूक चलावन जाओगी, हम भी हंसते हुए जवाब देते जांगे कारगिल में भी जांगे, मगर थोड़ा टरेनिंग तो कर लें, तब तो जांगे.'' चंद्रो तोमर की तीन बेटियां और दो बेटे हैं. इनके पंद्रह नाती-पोतों वाली चंद्रो आज भी रोजाना तीन घंटे जाकर शूटिंग क्लब में बैठती हैं. लड़के-लड़कियों को निशाना साधने का कौशल सिखाती हैं. शूटिंग क्लब में बातचीत के दौरान जब उनसे निशाना साधने को कहा तो उन्होंने एक बार में ही खट से दस मीटर की दूसरी पर बने अपने टारगेट को भेद दिया.
जोहड़ी गांव में 2015 में 40-45 बच्चे शूटिंग सीख रहे थे और उस समय के जोहड़ी राइफल्स क्लब के कोच वाजिद अली ने बताया आज करीब 60 बच्चे यहां निशानेबाजी सीखने आते हैं. इनमें 30 से ज्यादा लड़किया हैं.
दिग्गज निशानेबाजों की टकशाला है जोहड़ी
दादी के इस गांव मे देश के बड़े-बड़े निशानेबाज तैयार हो रहे हैं. अर्जुन अवार्ड पाने वाले विवेक सिंह ने भी यहीं से निशानेबाजी सीखी है. इसके अलावा इस राइफल क्लब से अब तक लगभग 200 से ज्यादा ऐसे निशानेबाज निकल चुके हैं जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है. शेफाली तोमर, वर्षा तोमर, सीमा तोमर, सर्वेश तोमर, रवि तोमर समेत दस से भी ज्यादा निशानेबाज तो दादी के खानदान के ही हैं. चंद्रो तोमर खुद राष्ट्रीय स्तर पर अब तक 25 से ज्यादा मेडल पा चुकी हैं. प्रकाशी तोमर भी कमोबेश इतने ही मेडल पा चुकी हैं.
अनपढ़ तो छोड़िए आइजी, डीआइजी तक लड़का लड़की में फर्क करते हैं
चंद्रो तोमर ने लैंगिक भेदभाव वाली बात पर अपना एक किस्सा बताया. बात 2004 की है. चंद्रो ने बताया कि मेरा मुकाबला एक डी.आई.जी.से हुआ.
मैंने उनको हरा दिया. जब मीडिया वाले मेरी और उनकी फोटो ले रहे थे तो वह भड़क गए और कहने लगे कि एक औरत से हारने के बाद काहे की फोटो.
उन्हें हारने से ज्यादा इस बात का दुख था कि वह एक औरत से हारे. उन्होंने न मेरी तरफ एक भी बार देखा न मीडिया को फोटो लेने दी. तो आप ही बताइये कि जब मैं डी.आई.जी को हरा सकती हूं तो लड़कियां सबकुछ कर सकती हैं.
2015 के अक्तूबर महीने में गांव में रिपोर्टिंग के दौरान हुई बातचीत के आधार पर
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