स्कूल फेल छात्र कैसे हों पास

दूसरे स्कूलों में मर्ज या बंद किए जा रहे स्कूलों की वजह से राजस्थान के लाखों बच्चों का सरकारी स्कूलों से हुआ मोहभंग, बीच में छोड़ रहे पढ़ाई

टूटता भरोसा अजमेर जिले का उर्दू माध्यम का एक सरकारी स्कूल जिसे पास के हिंदी माध्यम विद्यालय में मिला दिया गया

अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के पास उर्दू माध्यम का एक स्कूल आजादी से 10 साल पहले शुरू हुआ था. इसी राजकीय बालिका सेकेंडरी स्कूल, बड़बाव को पिछले साल इम्तहान से महीने पर पहले पास के ही हिंदी माध्यम के स्कूल में विलीन कर दिया गया. मिलाने से पूर्व वहां 300 छात्राएं उर्दू विषय में तालीम ले रही थीं जिनमें से 22 की पढ़ाई बीच में ही छूट गई.

इसी स्कूल की सानिया ने छठी जमात तक उर्दू मीडियम में तालीम हासिल की थी. मर्ज होने के बाद उसे हिंदी मीडियम स्कूल में दाखिला लेना पड़ा मगर नई जबान में पढ़ाई समझना उसके लिए बेहद मुश्किल हो गया. ऐसे में सानिया ने स्कूल जाना बंद कर दिया. पांच साल पहले ही इस स्कूल को एक किलोमीटर दूर अमरकोट से बड़बाव में शिफ्ट किया गया था.

उस वक्त भी करीब 50 छात्राओं को बीच में ही स्कूल छोड़ना पड़ा था. स्कूल बंद करने के खिलाफ अदालत में याचिका दायर करने वाले एडवोकेट रईस खान कहते हैं, ''सरकार कम नामांकन वाले स्कूलों को बंद कर रही थी मगर बड़बाव स्कूल में तो 300 छात्राओं का नामांकन था. दरअसल, सरकार को कम नामांकन से नहीं, उर्दू विषय से दिक्कत है.''

बीच सत्र में बंद होने वाला यह राजस्थान का इकलौता स्कूल नहीं था. ऐसे 450 से ज्यादा स्कूलों को कम या शून्य नामांकन बताकर या तो नजदीकी स्कूलों में मर्ज या फिर बंद कर दिया गया. अकेले अजमेर में ही आठ उर्दू माध्यम स्कूलों को बंद करने का फैसला किया गया जिसका प्रदेशव्यापी विरोध हुआ. इसका नतीजा है कि पिछले कुछ साल में प्रदेश के लाखों बच्चों का स्कूलों से मोहभंग हुआ है.

सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में राज्य के सरकारी स्कूलों से करीब बीस लाख छात्रों ने दूरी बना ली. करोड़ों रुपए की योजनाएं चलाने, मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म, बैग, साइकिल, टैबलेट, मिड-डे मील और दूध जैसी सुविधाएं देने के बावजूद सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या तेजी से घटना प्रदेश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर लोगों के घटते भरोसे की कहानी है. 

यूडाइस (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन) के आंकड़ों पर गौर करें तो राजस्थान के 65,000 सरकारी स्कूलों (1-12) में सत्र 2021-22 में 97,15,989 विद्यार्थी नामांकित थे. मगर 2024-25 के सत्र तक आते-आते यह संख्या घटकर 78,03,846 रह गई. यानी तीन वर्षों में करीब 19.12 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूल छोड़ दिए. इसके उलट निजी स्कूलों में इसी अवधि में 23 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों की बढ़ोतरी दर्ज की गई. वर्ष 2021-22 में निजी स्कूलों में 75,16,590 विद्यार्थी थे, जो अब बढ़कर 98,20,465 तक पहुंच गए हैं.

प्राथमिक स्कूलों का भी हाल कमोबेश ऐसा ही है. वर्ष 2022-23 में प्रदेश के 47,540 प्राथमिक स्कूलों में 32,12,000 बच्चों का नामांकन था जो चार साल बाद 2025-26 में घटकर 22,65,000 रह गया है. इस अवधि में 2,801 स्कूल बंद या मर्ज हुए हैं. पिछले चार साल में राजस्थान ही नहीं, बल्कि देशव्यापी नामांकन में कमी दर्ज हुई है.

यूडाइस के अनुसार, पिछले एक साल में देशभर के स्कूलों में नामांकन 13.09 करोड़ से घटकर 12.74 करोड़ रह गया. यानी, सरकारी स्कूलों में करीब 35 लाख बच्चे कम हुए हैं. सीमावर्ती बाड़मेर जिले की स्थिति इस संकट की जमीनी तस्वीर पेश करती है. जिले के 97 सरकारी प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं जहां दस से भी कम विद्यार्थी नामांकित हैं. सैकड़ों स्कूलों में नामांकन 20 से कम है.

शिक्षाविद् सरकारी स्कूलों में नामांकन घटने की कई वजहें मानते हैं. पानी, बिजली, टॉयलेट और खेल मैदान जैसी सुविधाओं की बुरी हालत; शिक्षकों की गैर शैक्षिक कार्यों में ड्यूटी; और निजी स्कूलों को आरटीई के तहत दी जाने वाली आर्थिक मदद इनमें प्रमुख हैं.

भीलवाड़ा जिले के दौलतपुरा स्कूल में मिड डे मील खाने के बाद खुद ही बर्तन साफ करते बच्चे

शैक्षिक अधिकारों और जागरुकता को लेकर लंबे समय से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता विजय गोयल कहते हैं, ''जब स्कूलों में हजारों पद खाली हों और एक-एक शिक्षक के भरोसे पांच-पांच कक्षाएं चल रही हों, तब नामांकन घटना स्वाभाविक है. पता नहीं सरकारें सरकारी शिक्षा को मजबूत करना चाहती हैं या धीरे-धीरे लोगों को निजी स्कूलों पर निर्भर होने के लिए मजबूर कर रही हैं.''

राज्य में सरकारी स्कूलों में फिलहाल शिक्षकों के 1.25 लाख पद खाली पड़े हैं. यह स्थिति और विकट हो जाती है जब स्कूलों के निरीक्षण और संचालन के लिए जिम्मेदार जिला शिक्षा अधिकारी और प्रधानाचार्य जैसे पद रिक्त हों. सूबे में फिलहाल 59 में से 40 जिला शिक्षा अधिकारियों के पद रिक्त चल रहे हैं और 17,764 प्रिंसिपल पदों में से 7,000 से ज्यादा खाली हैं. कुल मिलाकर राज्य के शिक्षा विभाग में करीब 84,000 से ज्यादा पद रिक्त हैं (देखें बॉक्स).

प्रदेश में स्कूलों पर चलाई जा रही कैंची को लेकर विपक्ष हमलावर है. पूर्व शिक्षा मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा कहते हैं, ''पूर्ववर्ती वसुंधराराजे सरकार ने समन्वय के नाम पर 22,204 सरकारी स्कूलों को बंद किया था. अब भजनलाल सरकार ने 7,352 स्कूलों को बंद कर दिया है. भाजपा इन स्कूलों को बर्बाद कर शिक्षा को निजी हाथों में सौंपना चाहती है.'' वहीं राज्य के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर स्कूल मर्ज करने का पूरा दोष पूर्ववर्ती कांग्रेस पर मढ़ते हैं. दिलावर का कहना है, ''कांग्रेस ने बिना सोचे-समझे राजनीतिक आधार पर इतने स्कूल खोल दिए जिनमें बच्चों के नामांकन थे ही नहीं. हमारी सरकार ने इन्हें समन्वित कर 28,000 शिक्षकों की भर्ती की है और 60,000 नई भर्तियों की प्रक्रिया शुरू की है.''

यूडाइस रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट रेट 3.40 प्रतिशत है और उच्च प्राथमिक स्तर पर 3.60 प्रतिशत. सूबे में 215 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां नामांकन शून्य है. वहीं, सरकार बच्चों के लिए ढेर सारी योजनाएं चलाने का दावा करती है. इन दावों के अनुसार, सूबे में कक्षा नौवीं की 3,25,000 बालिकाओं को साइकिल, 33,000 छात्रों को निशुल्क टैबलेट, 82,60,000 को मुफ्त पाठ्य पुस्तकें, 18,00,000 बालिकाओं को निशुल्क सैनेटरी नैपकीन, 70,00,000 छात्रों को निशुल्क यूनिफार्म और बैग तथा 62,64,000 बच्चों को मिड डे मील और दूध उपलब्ध कराया जा रहा है. बावजूद इसके सरकारी स्कूलों में नामांकन का गिरता ग्राफ सरकार की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े करता है.

कोरोना महामारी से उपजे आर्थिक संकट के बीच बड़ी संख्या में अभिभावकों ने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में कराया था. मगर जैसे ही हालात सामान्य हुए, वे निजी स्कूलों की ओर लौट गए. यह उस टूटते भरोसे की कहानी है जो कभी सरकारी स्कूलों की ताकत हुआ करता था. क्या भजनलाल सरकार वह भरोसा वापस ला पाएगी?

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