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कैमरे वालियां पुस्तक की सबसे खास बात यह है कि पुस्तक प्रत्यक्ष तर्कों से नहीं बल्कि जीवन प्रसंगों के जरिए बताती है कि फोटोग्राफर और फोटो पत्रकार में क्या अंतर है?

- सुमन पाण्डेय
महिला फोटोग्राफर्स के संघर्ष, साहस और पेशेवर यात्राओं का एक महत्वपूर्ण संकलन है कैमरे वालियां. 168 पन्नों की इस पुस्तक को वाणी प्रकाशन ने छापा है और भाषा का संपादन किया है विष्णु नागर ने.
पुस्तक की लेखिका सर्वेश स्वयं एक फोटोग्राफर हैं, जिन्होंने निजी और सामाजिक संघर्षों के बीच अपनी पहचान निर्मित की है. यही कारण है कि पुस्तक में स्त्री संघर्ष का पक्ष अत्यंत प्रबल होकर उभरता है.
पुस्तक में होमई व्यारावाला, सरस्वती चक्रवर्ती, कृष्णा राय, उमा कदम, शुचेता दास, अनीता खेमका, गीतिका ताल्लुकदार, इंदु बंसल डांग, जयश्री पुरी, सुमन कंसारा, कीर्ति सुर्वे, अश्विनी सावंत, अनुजा गुप्ता, सौम्य खंडेलवाल, जसजीत प्लाहा, देबो सुष्मिता, मनीषा मंडल और स्वयं सर्वेश जैसी 34 भारतीय महिला फोटोग्राफरों के संघर्ष और उपलब्धियों का उल्लेख है.
सबसे खास बात है कि पुस्तक प्रत्यक्ष तर्कों से नहीं बल्कि जीवन प्रसंगों के जरिए प्रश्न उठाती है कि फोटोग्राफर और फोटो पत्रकार में क्या अंतर है?
पुस्तक के कई प्रसंग अत्यंत प्रभावशाली हैं. देवराला के रूप कंवर सती कांड के चित्र सरस्वती चक्रवर्ती के कैमरे से खींचे जाने का उल्लेख हो या सुनामी, खेल और हिंसक परिस्थितियों में महिला फोटोग्राफरों की उपस्थिति. ये उदाहरण इस मिथक को तोड़ते हैं कि स्त्री जोखिमपूर्ण दृश्य-संसार का सामना नहीं कर सकती.
वे घर, पति, समाज, अवसर और पेशेवर असमानताओं से लड़ते हुए कैमरे को केवल आजीविका नहीं बल्कि अभिव्यक्ति का माध्यम बनाती हैं. पुरुषों की भीड़ में धक्के, उपहास, तिरछी निगाह और असुरक्षित परिस्थितियां उनके पेशे का हिस्सा बन जाती हैं. यही संघर्ष पुस्तक को भारतीय दृश्य-संस्कृति के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज में बदल देता है.
हालांकि इसमें संघर्ष को इतना प्रमुख बना दिया गया है कि उनके कलात्मक व्यक्तित्व, दृश्य-दृष्टि, छायांकन शैली और फोटोग्राफी की रचनात्मकता पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो पाती. किसी भी फोटोग्राफर की सबसे बड़ी पहचान उसके संघर्ष से ज्यादा उसकी तस्वीरें होती हैं.
एक फोटोग्राफर केवल सूचना नहीं देता, बल्कि समय और समाज का दृश्य इतिहास भी निर्मित करता है. पुस्तक में प्रयुक्त अनेक छवियों के नीचे उनका विवरण नहीं दिया गया, जिससे उनके संदर्भ और सांस्कृतिक अर्थ अधूरे रह जाते हैं.
खासकर होमई व्यारावाला के संदर्भ में 'बॉयफ्रेंड’ जैसे शब्द का प्रयोग अनावश्यक प्रतीत होता है. मानेकशॉ व्यारावाला बाद में उनके पति बने और प्रारंभिक समय में उनकी तस्वीरों को प्रकाशित होने का माध्यम भी.
इसी प्रकार जैकलीन कैनेडी को 'अमेरिका की पहली फैशन डिजाइनर’ कहना तथ्यात्मक त्रुटि है; वे अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की पत्नी और एक प्रसिद्ध फैशन आइकन थीं.
फिर भी यह पुस्तक भारतीय महिला फोटोग्राफरों के संघर्षशील जीवन को सामने लाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास तो है ही.
साथ ही कृति यह प्रश्न भी छोड़ जाती है कि यदि कलाकार की कलाकृतियों और उसकी दृश्य-दृष्टि पर पर्याप्त चर्चा न हो तो आने वाली पीढ़िया कलाकार को किस रूप में याद रखेंगी?
कहा जाता है कलाकार चला जाता है, उसकी कला जीवित रहती है. ऐसे में कला को ही यदि पर्याप्त स्थान न मिले, तो कलाकार की स्मृति को जीवित कैसे रखा जा सकेगा?
पुस्तक का नाम: कैमरे वालियां
लेखक: सर्वेश
प्रकाशन: भारतीय ज्ञानपीठ
कीमत: 350 रुपए.